भारत का बजट 2025 : एक रणनीतिक चूक ?
Independent, Journalism URGENTLY Needs Support Today.
भारत का बजट 2025 : एक रणनीतिक चूक ?
India's Budget 2025: Strategic Misstep? का हिन्दी रूपांतर एवं सम्पादन
~ सोनू बिष्ट
भारत का 2025 का केंद्रीय बजट, जो चौंका देने वाली राशि ₹50 लाख करोड़ का है, देश द्वारा किए गए सबसे बड़े वित्तीय प्रयोगों में से एक है, जबकि बजट, आर्थिक रोडमैप के रूप में काम करते हैं।
इसलिए, इस वर्ष की वित्तीय योजना इसके रणनीतिक उद्देश्य और क्रियान्वयन से जुड़े कई सवाल उठाती है।
मुख्य आंकड़ों और सतही स्तर की छान- बीन से परे, बजट की गहराई से जांच करने पर गलत प्राथमिकताओं, अप्रभावी वित्तीय आवंटन और छूटे अवसरों की चिंताजनक तस्वीर सामने आती है।
समग्र स्थिति पर विचार: बहीखाते से परे एक बजट
राष्ट्रीय बजट केवल सरकारी खातों को संतुलित करने वाला बहीखाता नहीं है। यह एक रणनीतिक दस्तावेज है जो देश की आर्थिक दृष्टि और सामाजिक प्राथमिकताओं को दर्शाता है।
भारत के बजट को आदर्श रूप से सतत आर्थिक विकास, नवाचार और सामाजिक स्थिरता के लिए उत्प्रेरक के रूप में कार्य करना चाहिए।
हालाँकि, वर्तमान वित्तीय रणनीति में यह व्यापक दृष्टिकोण गायब दिखता है।
“
सरकार ने दो करोड़ करदाताओं को सालाना लगभग ₹70,000 की कर राहत देने का वादा किया है।
यह बजट देश के सामाजिक ताने-बाने और अंतरराष्ट्रीय धारणा से गहराई से जुड़ा हुआ है। यह भारत की सॉफ्ट पावर को दर्शाता है, जो घरेलू शांति और वैश्विक निवेशकों के विश्वास को प्रभावित करता है।
फिर भी, आर्थिक समावेशिता और दीर्घकालिक विकास को बढ़ावा देने के बजाय, 2025 का बजट अल्पकालिक राजनीतिक लाभ को प्राथमिकता देता प्रतीत होता है, जबकि महत्वपूर्ण संरचनात्मक सुधारों की उपेक्षा की गई है।
विदेशी निवेशकों का विश्वास कम होता जा रहा है
भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) में गिरावट चिंताजनक तस्वीर पेश करती है। अंतरराष्ट्रीय निवेशकों की अनिच्छा कोई अलग-थलग घटना नहीं है - यह नीतिगत अनिश्चितता, विनियामक बाधाओं और शासन की अक्षमताओं के बारे में व्यापक चिंताओं को दर्शाती है।
भारत से अधिक स्थिर अर्थव्यवस्थाओं की ओर पूंजी का पलायन बढ़ती बेचैनी को रेखांकित करता है।
यहां तक कि घरेलू निवेशक भी विदेशों में सुरक्षित निवेश स्थलों की तलाश कर रहे हैं।
इसका एक उदाहरण भारत के शीर्ष उद्योगपतियों का पलायन है, जिसमें मुकेश अंबानी भी शामिल हैं, जिन्होंने अपने वैकल्पिक पारिवारिक ठिकानों को देश से बाहर स्थानांतरित कर दिया है।
यह एक गहरे प्रणालीगत मुद्दे को दर्शाता है: यदि भारत के अपने व्यापारिक नेता इसके आर्थिक भविष्य को लेकर झिझक रहे हैं, तो वैश्विक निवेशकों को इससे अलग क्यों महसूस करना चाहिए?
बजट इन चिंताओं को दूर करने के लिए कुछ नहीं करता है, निवेशकों का विश्वास बढ़ाने या कारोबारी माहौल को बेहतर बनाने के लिए ठोस उपाय पेश करने में विफल रहता है।
पारदर्शिता की कमी: एक जनगणना जो कभी नहीं हुई
सटीक डेटा प्रभावी नीति-निर्माण का आधार है। हालाँकि, 2021 की जनगणना आयोजित करने में भारत की लगातार देरी पारदर्शिता के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता पर चिंताएँ पैदा करती है।
मूल रूप से कोविड -19 के कारण स्थगित की गई जनगणना 2022 या, अधिक से अधिक 2023 में आयोजित की जानी चाहिए थी।
तथापि, जैसे-जैसे हम 2025 में प्रवेश कर रहे हैं, इस महत्वपूर्ण अभ्यास के लिए अभी भी कोई आधिकारिक समय-सीमा निर्धारित नहीं है।
“
भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) में गिरावट चिंताजनक तस्वीर पेश करती है
अपडेट की हुई जनसांख्यिकीय और आर्थिक आंकड़ों के बिना सरकार यह कैसे सुनिश्चित कर सकती है कि, बजट का आवंटन सटीक रूप से विशेष वर्ग के लोगों को ध्यान में रख कर किया गया है?
विश्वसनीय आंकड़ों की कमी से वित्तीय नियोजन की प्रभावशीलता कम हो जाती है, जिससे नीति निर्माताओं को आंखों पर पट्टी बांधकर चलना पड़ता है।
विश्वसनीय आंकड़ों के अभाव में, हम कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं कि आर्थिक लाभ समाज के सही वर्गों तक पहुंचे?
असल में फायदा किसको? मध्यम वर्ग के साथ धोखा
बजट में मध्यम वर्ग के उत्थान का दावा किया गया है, लेकिन हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है। मध्यम वर्ग एक अस्पष्ट शब्द है, जो भूगोल और आय के स्तर के आधार पर बहुत भिन्न होता है।
देश की 140 करोड़ की आबादी में से केवल 9.5 करोड़ भारतीय ही आयकर रिटर्न दाखिल करते हैं तथा उनमें से 6 करोड़ लोग शून्य कर योग्य आय घोषित करते हैं, जिससे कर का दायरा चिंताजनक रूप से संकीर्ण बना हुआ है।
सरकार ने दो करोड़ करदाताओं को सालाना लगभग ₹70,000 की कर राहत देने का वादा किया है।
हालांकि, इस राशि से कोई खास आर्थिक प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है। क्या अतिरिक्त ₹70,000 वास्तव में खर्च करने के पैटर्न को बदल देंगे या सार्थक तरीके से उपभोग को बढ़ावा देंगे?
इसका उत्तर संदिग्ध है। एक छोटे से वर्ग को सतही राहत प्रदान करने के बजाय, सरकार वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को तर्कसंगत बनाने जैसे व्यापक राजकोषीय सुधारों पर ध्यान केंद्रित कर सकती थी।
जीएसटी (GST) दरों में मात्र 1% की कटौती से सभी सामाजिक-आर्थिक समूहों में उपभोग को बढ़ावा मिल सकता था, जिसके दूरगामी आर्थिक लाभ होते।
अप्रयुक्त धनराशि (Unutilized Funds): सरकारी खर्च का भ्रम
बजट विश्लेषण से सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि सरकारी योजनाओं के लिए आवंटित धन का बहुत बड़ा हिस्सा अप्रयुक्त रह गया है। घोषित 105 योजनाओं में से लगभग 70-80% धन साल दर साल खर्च नहीं हो पाता।
यहां तक कि स्वच्छ भारत और राष्ट्रीय ग्रामीण जल जीवन मिशन जैसे प्रमुख कार्यक्रमों में भी क्रमशः केवल 50% और 30% धनराशि का उपयोग ही हुआ है।
इससे एक बुनियादी सवाल उठता है: क्या सरकार अपनी व्यय योजनाओं को क्रियान्वित करने में सचमुच अक्षम है, या फिर यह जानबूझ कर अधिक वादा करने और कम प्रदर्शन करने की रणनीति है?
“
140 करोड़ की आबादी में से केवल 9.5 करोड़ भारतीय ही आयकर रिटर्न दाखिल करते हैं
जब धनराशि कागजों पर आवंटित कर दी जाती है, लेकिन वास्तव में खर्च नहीं की जाती, तो इससे बिना किसी ठोस प्रभाव के राजकोषीय प्रतिबद्धता का भ्रामक आख्यान निर्मित होता है।
उदाहरण के लिए, कल्पना कीजिए कि सरकार हर साल 100 रुपये देने का वादा करती है, लेकिन केवल 30 रुपये वितरित करती है और पूरी राशि का क्रेडिट लेती रहती है।
निधियों का व्यवस्थित रूप से कम उपयोग भारत के राजकोषीय प्रशासन में एक गहरी खामी को उजागर करता है। यदि निधियों का उपयोग नहीं किया जाता है, तो वे कहां जाती हैं?
और वे वहां तक क्यों नहीं पहुंच रहे हैं जहां उनकी सबसे अधिक जरूरत है?
'नए भारत' का विरोधाभास
अंततः, यह बजट भारत की आर्थिक और सामाजिक प्राथमिकताओं में एक दिलचस्प विरोधाभास को जन्म देता है।
जबकि सरकार 50% से अधिक आबादी को मुफ्त राशन उपलब्ध कराती है, वहीं दूसरी ओर वह विदेशी कंपनियों को प्रीमियम पालतू भोजन और कुत्तों व बिल्लियों की लक्जरी नस्लों के आयात और बिक्री की अनुमति देती है।
यह तीव्र विरोधाभास भारत के आर्थिक व्यवहार में गहरी विसंगति को दर्शाता है।
जब देश की आधी आबादी सरकारी सब्सिडी वाले खाद्यान्न पर निर्भर है, जबकि एक बढ़ता हुआ वर्ग *आयातित विलासिता उत्पादों (Imported luxury products) में लिप्त है, तो यह सामाजिक एकजुटता के बारे में क्या कहता है?
इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत के मानवीय मूल्यों के अनुरूप आर्थिक व्यवहार को आकार देने में सरकार को क्या भूमिका निभानी चाहिए?
निष्कर्ष: लक्ष्य से चूका बजट
एक राष्ट्रीय बजट का आधार, सतत आर्थिक विकास, धन के समान वितरण और रणनीतिक राष्ट्रीय विकास के लिए मार्गदर्शक बल के रूप में काम करने वाला होना चाहिए। दुर्भाग्य से, भारत का बजट 2025 इन सभी मोर्चों पर कमज़ोर साबित होता दिख रहा है।
निवेशक आत्मविश्वास के धीरे धीरे खत्म होने से लेकर डेटा पारदर्शिता की कमी तक, मध्यम वर्ग को गलत दिशा में दी गयी राहत से लेकर धन के लगातार कम उपयोग तक, बजट में प्रणालीगत कमजोरियों उजागर हुई है जिन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता है।
चूंकि भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है, इसलिए यह बजट देश को एक स्थिर, व्यापार-अनुकूल और दूरदर्शी अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित करने का एक अवसर था।
इसके बजाय, यह गलत प्राथमिकताओं और खोई हुई क्षमता की चेतावनी भरी कहानी बनने का जोखिम उठाता है।
भारत को असल में एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभरने के लिए, इसकी *राजकोषीय नीतियाँ को डेटा-संचालित निर्णय लेने, कुशल संसाधन आवंटन (Resource allocation) और दीर्घकालिक संरचनात्मक सुधारों के प्रति प्रतिबद्धता पर आधारित होनी चाहिए।
वरना, तब तक, ‘नए भारत’ का विजन, वास्तविकता के बजाय सिर्फ एक विजन ही रहेगा।
*सरकारें स्थिर और टिकाऊ विकास को बढ़ावा देने के लिए व्यय और कर लगाने की शक्तियों का उपयोग करती हैं। राजकोषीय नीति अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने के लिए सरकारी खर्च और कराधान का उपयोग है।
सरकारें आमतौर पर मजबूत और टिकाऊ विकास को बढ़ावा देने और गरीबी को कम करने के लिए राजकोषीय नीति का उपयोग करती हैं।
*विदेश से मंगाए जाने वाले महंगे सामान यानी आभूषण, कारें, कपड़े, जूते, घड़ियां, और कॉस्मेटिक्स वगैरह को विलासिता की आयातित उत्पाद कहते हैं।
To Comment: connect@expertx.org
Support Us - It's advertisement free journalism, unbiased, providing high quality researched contents.