सत्ता को चुनौती देती शिक्षा: क्यों 'जागरूक नागरिक' सबसे बड़ा खतरा है?
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सत्ता को चुनौती देती शिक्षा: क्यों 'जागरूक नागरिक' सबसे बड़ा खतरा है?
शिक्षा की दिशा और दशा यह तय कर सकती है कि लोकतंत्र किस रास्ते पर जाएगा, और देश को चलाने वाले नेताओं की असल नीयत क्या है।
शिक्षा हमारे भीतर तार्किक सोच (Critical thinking), राजनैतिक समझ और एक नागरिक के रूप में आत्मविश्वास को मजबूत करती है। यही वजह है कि शिक्षित नागरिक अक्सर गलत व्यवस्था और सत्ता पर सवाल उठाते हैं और बदलाव लाने वाले आंदोलनों से जुड़ते हैं।
2. स्वतंत्र सोच से डरते हैं तानाशाह:
इतिहास गवाह है कि तानाशाह सरकारों (Authoritarian regimes) ने हमेशा शिक्षा को कमज़ोर करने, उसे अपने नियंत्रण में रखने या उसका रूप बिगाड़ने की कोशिश की है। वे ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि आज़ाद और स्वतंत्र सोच ही व्यवस्था के खिलाफ विरोध (Dissent) और एकजुट होकर किए जाने वाले आंदोलनों को जन्म देती है।
3. आज के दौर का नया खतरा (धीमा ज़हर):
आज के दौर में लोकतंत्रों के सामने खतरा केवल सीधे तौर पर किताबों को प्रतिबंधित करने (Censorship) का नहीं है। बल्कि असली खतरा शिक्षा के स्तर का धीरे-धीरे गिरना है, जो कि शिक्षा के बढ़ते बाज़ारीकरण (Commercialization), अमीरी-गरीबी के बीच के भेदभाव, इंटरनेट के भटकाव और पढ़ाई से सामाजिक बदलाव की भावना के खो जाने के कारण हो रहा है।
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मई 2026
सरकारें और जनता की सोच
राजनीति के एक कड़े और गंभीर विचार (Radical philosophy) के अनुसार, लोकतांत्रिक सरकारें दिल से कभी यह नहीं चाहतीं कि उनके देश की जनता बहुत ज़्यादा समझदार, पढ़ी-लिखी और हर बात पर सवाल उठाने वाली बने। यही कारण है कि वे शिक्षा को बहुत गंभीरता से नहीं लेती हैं।
वास्तव में, कोई सरकार जितनी ज़्यादा तानाशाह होती है, वह शिक्षा व्यवस्था पर उतना ही ज़्यादा हमला करती है। इस सिद्धांत के अनुसार, आधुनिक सरकारें ऐसे नागरिक पसंद करती हैं जो उनकी हर बात मान लें, मनोरंजन और अन्य चीज़ों में भटके रहें और जिन्हें आसानी से संभाला जा सके।
इसलिए, सरकारें सरकारी शिक्षा पर कम पैसा खर्च करती हैं या पढ़ाई के स्तर को कमज़ोर कर देती हैं, ताकि जनता उनके राजनीतिक और आर्थिक दबदबे को चुनौती न दे सके।
इतिहास क्या कहता है?
ऊपरी तौर पर देखने पर इतिहास भी इस शक को सही साबित करता है। बहुत ज़्यादा पढ़े-लिखे लोगों पर मनमर्जी से राज करना बेहद मुश्किल होता है।
इतिहास गवाह है कि यूनिवर्सिटीज़ (विश्वविद्यालय) हमेशा से विरोध, प्रदर्शन और वैचारिक क्रांति के गढ़ (Breeding grounds) रहे हैं। पढ़े-लिखे लोग युद्धों पर सवाल उठाते हैं, भ्रष्टाचार का पर्दाफ़ाश करते हैं, आंदोलन चलाते हैं और पुरानी सोच वाली सरकारों की नींव हिला देते हैं।
एक उलझी हुई हकीकत
फिर भी, पिछली सदी का इतिहास एक बहुत ही पेचीदा और विरोधाभास (उल्टी हकीकत) से भरा सच दिखाता है। सच यह भी है कि आज के आधुनिक लोकतंत्र केवल इसलिए ज़िंदा हैं क्योंकि वे ऐसे शिक्षित नागरिक पैदा करते हैं जो सही-गलत को परखने (Critical thought) की क्षमता रखते हैं।
इसके विपरीत, लंबे समय तक चलने वाली तानाशाह सरकारें हमेशा जनता की अज्ञानता, शिक्षा की बर्बादी, सेंसरशिप (पाबंदियों) और गरीबी पर टिकी रही हैं ताकि वे अपनी सत्ता बचा सकें।
इसलिए, शिक्षा और राजनैतिक व्यवस्था का रिश्ता इतना सीधा और सरल नहीं है। शिक्षा एक तरफ तो लोकतंत्र को मजबूत और स्थिर बनाती है, लेकिन दूसरी तरफ वह गलत काम करने वाली सरकारों के लिए खतरा भी पैदा करती है।
आधुनिक राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि:
लोकतंत्र को ज़िंदा रहने के लिए जागरूक और सवाल उठाने वाले (Critical) नागरिकों की ज़रूरत होती है, लेकिन
सरकारों को अक्सर ऐसे समझदार नागरिक पैदा करने के परिणामों से डर लगता है।
पढ़ाई सिर्फ नौकरी के लिए नहीं, सोच बदलने के लिए है
यह बात राजनैतिक समाजशास्त्र (Political sociology) और आधुनिक इतिहास से पूरी तरह साबित होती है कि उच्च शिक्षा इंसानों के भीतर विरोध की भावना को जन्म देती है।
उच्च शिक्षा केवल इंजीनियरिंग, मेडिकल साइंस या अकाउंटेंसी जैसी कोई व्यावसायिक या नौकरी पाने की ट्रेनिंग (Vocational training) नहीं है।
यह असल में हमारे सोचने के तरीके को बदल देती है, हमारी राजनैतिक समझ को बढ़ाती है, जटिल जानकारियों को समझने की क्षमता देती है और हमारे भीतर वह आत्मविश्वास पैदा करती है जो किसी भी गलत व्यवस्था के खिलाफ खड़े होने के लिए ज़रूरी है।
एक पढ़ा-लिखा नागरिक सरकार की कही-सुनी बातों को आँख मूँदकर सच नहीं मानता। ऐसा नागरिक:
अलग-अलग आँकड़ों की तुलना करता है,
नेताओं के बड़े-बड़े भाषणों और दावों पर सवाल उठाता है,
सरकारी संस्थाओं की कमियों और उनके अंतर्विरोधों को पहचानता है, और
यह समझता है कि सत्ता और पैसा कहाँ और किसके पास जमा हो रहा है।
यही कारण है कि तार्किक सोच का सत्ता या अधिकारियों के साथ टकराव होना बिल्कुल स्वाभाविक है।
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जब छात्रों ने सरकारों की नींव हिला दी
बीसवीं सदी में जैसे-जैसे उच्च शिक्षा का विस्तार हुआ, वैसे-वैसे दुनिया भर में राजनैतिक आंदोलनों की बाढ़ आ गई। इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण 1968 की वैश्विक छात्र क्रांति (Global student uprisings of 1968) है।
फ्रांस, पश्चिमी जर्मनी, मैक्सिको, इटली और अमेरिका जैसे देशों में जब कॉलेज और यूनिवर्सिटीज़ तेज़ी से बढ़े, तो वहाँ राजनैतिक रूप से जागरूक युवाओं की एक नई पीढ़ी तैयार हुई। इन युवाओं ने खुलेआम चुनौती दी:
सैन्यवाद (Militarism): बेवजह युद्ध लड़ने की नीति को,
पूंजीवाद (Capitalism): अमीरी-गरीबी बढ़ाने वाली आर्थिक व्यवस्था को,
अफ़सरशाही (Bureaucracy): सरकारी बाबुओं और अफसरों के तानाशाही रवैये को,
नस्लीय भेदभाव (Racial inequality): काले-गोरे के भेद को, और
सरकारी तानाशाही को।
फ्रांस की घटना:
मई 1968 में फ्रांस में छात्रों का प्रदर्शन इतना उग्र हो गया था कि वहाँ के राष्ट्रपति चार्ल्स डी गॉल (Charles de Gaulle) कुछ समय के लिए डरकर और छिपकर देश छोड़कर पश्चिमी जर्मनी (बाडेन-बाडेन) भाग गए थे।
उस समय फ्रांस के लाखों मजदूर भी छात्रों के साथ देशव्यापी हड़ताल में शामिल हो गए थे, जिसने पूरे देश को ठप (Paralyse) कर दिया था।
केंट स्टेट यूनिवर्सिटी का नरसंहार (Kent State Massacre)
इसी तरह अमेरिका में यूनिवर्सिटीज़ वियतनाम युद्ध के विरोध का मुख्य केंद्र (Nerve centres) बन गईं। छात्र आंदोलनों ने कॉलेजों को एक युद्ध के मैदान में बदल दिया, जहाँ युवा अपने नागरिक अधिकारों (Civil rights), साम्राज्यवाद के अंत, अभिव्यक्ति की आज़ादी (Free speech) और सामाजिक न्याय के लिए लड़ रहे थे।
इसी दौरान 4 मई 1970 को केंट स्टेट यूनिवर्सिटी (ओहियो, अमेरिका) में एक बेहद दर्दनाक घटना घटी, जिसे केंट स्टेट नरसंहार कहा जाता है। वहाँ की नेशनल गार्ड (सेना की एक टुकड़ी) ने शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे निहत्थे छात्रों पर गोलियाँ चला दीं, जिसमें 4 छात्रों की मौत हो गई और 9 गंभीर रूप से घायल हो गए।
ये छात्र इस बात का विरोध कर रहे थे कि अमेरिका ने वियतनाम युद्ध को ज़बरदस्ती कंबोडिया तक क्यों फैलाया, और वे युवाओं को ज़बरदस्ती सेना में भर्ती करने के सरकारी नियम के खिलाफ आवाज़ उठा रहे थे।
दक्षिण कोरिया का ग्वांगजू विद्रोह (1980)
छात्रों के विद्रोह का यही तरीका (Pattern) पूरे एशिया महाद्वीप में भी दिखाई दिया। साल 1980 में दक्षिण कोरिया के 'ग्वांगजू विद्रोह' के दौरान वहाँ के यूनिवर्सिटी छात्रों ने जनरल चुन डू-ह्वान (Chun Doo-hwan) की सैन्य तानाशाही के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्व किया।
इसे दक्षिण कोरिया में '18 मई का लोकतांत्रीकरण आंदोलन' भी कहा जाता है। हुआ यह था कि तख्तापलट करके सत्ता पर कब्ज़ा करने के बाद जनरल चुन डू-ह्वान ने देश में मार्शल लॉ (सैनिक कानून) लगा दिया, विपक्ष के नेताओं को जेल में डाल दिया, यूनिवर्सिटीज़ बंद कर दीं और मीडिया पर पाबंदियाँ लगा दीं।
जब छात्रों ने इसके खिलाफ आवाज़ उठाई, तो दक्षिण कोरिया की सेना ने इस आंदोलन को बड़ी बेरहमी से कुचल दिया, जिसमें लगभग 600 से लेकर 2,300 तक मासूम लोग मारे गए थे।
चीन का तियानमेन स्क्वायर प्रदर्शन (1989)
चीन में साल 1989 का प्रसिद्ध 'तियानमेन स्क्वायर प्रदर्शन' भी मुख्य रूप से पढ़े-लिखे और शहरों में रहने वाले छात्रों द्वारा ही चलाया गया था। ये छात्र सरकार में सुधार, पारदर्शिता और अपनी बात कहने की आज़ादी मांग रहे थे।
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) की सरकार ने इस आंदोलन पर टैंक चढ़वा दिए और हिंसक तरीके से इसे दबा दिया। इस घटना ने दुनिया भर के तानाशाहों को एक सबक सिखाया कि: पढ़े-लिखे नागरिक तब सबसे ज़्यादा खतरनाक हो जाते हैं, जब वे एकजुट होकर संगठन बनाने लगते हैं।
अरब स्प्रिंग (2011) और युवाओं का गुस्सा
साल 2011 में मिडिल ईस्ट (अरब देशों) में आई बदलाव की आंधी, जिसे 'अरब स्प्रिंग' कहा जाता है, इसी रास्ते पर चली थी। ट्यूनीशिया और मिस्र जैसे देशों में यूनिवर्सिटी से पढ़े-लिखे लेकिन बेरोज़गारी से परेशान युवाओं ने इंटरनेट, सोशल मीडिया और आपसी तालमेल का इस्तेमाल करके सालों से जमी तानाशाह सरकारों को उखाड़ फेंका।
राजनीति वैज्ञानिकों ने यहाँ एक बड़ा विरोधाभास देखा कि: सरकारों ने आधुनिकता के नाम पर खुद ही अपनी जनता को पढ़ाया-लिखाया, और बाद में उसी पढ़ी-लिखी जनता ने सरकारों की पुरानी और सुस्त व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह कर दिया।
शौध क्या कहते हैं ?
सच्चे आँकड़े और वैज्ञानिक रिसर्च भी इतिहास की इन बातों को सही साबित करते हैं। दुनिया के कई देशों में अनिवार्य स्कूली शिक्षा के नियमों पर किए गए अध्ययनों से पता चला है कि अगर बच्चे कुछ साल ज़्यादा पढ़ाई करते हैं, तो उनके द्वारा आंदोलनों, विरोध प्रदर्शनों और सामाजिक गतिविधियों में भाग लेने की संभावना 6 से 8 प्रतिशत तक बढ़ जाती है।
शिक्षा असल में इंसानों के भीतर ये तीन बदलाव लाती है:
राजनीति में उनकी रुचि बढ़ाती है,
सरकारी संस्थाओं और देश के नियमों के प्रति जागरूकता लाती है, और
गलत काम करने वाली सरकारों को चुनौती देने की हिम्मत देती है।
दुनिया की तानाशाह व्यवस्थाएँ इस बात को बहुत अच्छे से समझती हैं। यही कारण है कि इतिहास के लगभग हर तानाशाह ने आज़ाद और स्वतंत्र सोच रखने वाले पढ़े-लिखे लोगों को हमेशा शक की निगाह से देखा है।
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एक बड़ा सवाल और उसका जवाब
यदि शिक्षा सरकारों पर सवाल उठाने वाले, विद्रोही और राजनैतिक माँगें करने वाले नागरिक पैदा करती है, तो फिर लोकतांत्रिक देश जनता की पढ़ाई-लिखाई पर सरकारी खजाने का इतना बड़ा हिस्सा क्यों खर्च करते हैं?
इसका सीधा सा जवाब है: क्योंकि शिक्षा के बिना लोकतंत्र पूरी तरह बर्बाद हो जाएगा।
राजनैतिक वैज्ञानिकों ने यह साबित किया है कि शिक्षा और लोकतंत्र की स्थिरता (Democratic stability) का आपस में बहुत गहरा संबंध है।
लोकतंत्र सिर्फ चुनाव कराने से नहीं चलता, बल्कि यह नागरिकों के अच्छे व्यवहार, देश के नियमों की समझ, सरकारी संस्थाओं पर भरोसे और जनता के संयम पर टिकता है। और ये सभी बातें सीखी जाती हैं।
लोकतंत्र में राजनैतिक ताकत और आर्थिक लाभ किसी एक राजा या छोटे से अमीर गुट (Ruling elite) के हाथों में नहीं होते, बल्कि वे करोड़ों लोगों में बंटे होते हैं। (यदि देश में 'K'-आकार की आर्थिक तरक्की हो रही है, यानी अमीर और अमीर हो रहा है और गरीब और गरीब, तो समझो कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में कोई बड़ी कमी या खोट है)।
इसलिए, नागरिकों के मन में संविधान के नियमों, कानून के शासन (Rule of law), अल्पसंख्यकों के अधिकारों (Minority rights) और देश की संस्थाओं के प्रति गहरा सम्मान होना ज़रूरी है। अगर नागरिकों में ये आदतें नहीं होंगी, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था इन खतरों के सामने घुटने टेक देगी:
हेरफेर करने वाले भ्रष्ट नेता (Manipulators),
पूंजीपतियों और नेताओं की साठगांठ (Cronyism),
अफ़वाहें और साज़िश रचने वाले आंदोलन (Conspiracy movements),
धर्म और जाति के नाम पर समाज का बँटवारा (Sectarian polarization), और
तानाशाही कब्ज़ा (Authoritarian capture)।
शिक्षा असल में समाज को इन सभी खतरों से बचाती है। स्कूल सिर्फ अक्षर ज्ञान या नौकरी की कला (Technical skills) नहीं सिखाते, बल्कि वे नागरिकों को आपस में मिलकर काम करना और सहयोग करना सिखाते हैं।
वे देश के नागरिकों को एक सूत्र में पिरोते हैं, उन्हें सार्वजनिक जीवन में हिस्सा लेने के लिए प्रेरित करते हैं और देश के नियमों को मानने की आदत पैदा करते हैं।
दूसरे विश्व युद्ध के बाद यूरोप का बदलाव
दूसरे विश्व युद्ध की तबाही के बाद पश्चिमी यूरोप के देशों ने अपनी सरकारी शिक्षा व्यवस्था का बहुत बड़े पैमाने पर विस्तार किया। उनका मकसद सिर्फ फैक्ट्रियों के लिए मजदूर तैयार करना नहीं था, बल्कि वे अपने देशों को दोबारा फासीवाद की गर्त में जाने से बचाना चाहते थे।
उस दौर के महान नेताओं को यह बात अच्छे से पता थी कि एक अच्छा लोकतांत्रिक नागरिक बनने के गुण बच्चों में बचपन से ही पैदा करने पड़ते हैं।
अमेरिका का 'जीआई बिल' (GI Bill)
अमेरिका को भले ही एक आज़ाद बाज़ार (Free-market) वाला देश माना जाता हो, लेकिन उसने भी इतिहास में शिक्षा पर बहुत बड़ा सरकारी निवेश किया है। साल 1945 में दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका की सरकार 'जीआई बिल' (GI Bill) लेकर आई।
इसके तहत युद्ध से लौटे लाखों पूर्व सैनिकों को मुफ्त में यूनिवर्सिटी की पढ़ाई करवाई गई। इसने आधुनिक इतिहास में पढ़े-लिखे मध्यम वर्ग की सबसे बड़ी फौज खड़ी कर दी।
यही पढ़ी-लिखी आबादी शीत युद्ध (Cold War) के दौरान अमेरिकी लोकतंत्र की स्थिरता और उसकी आर्थिक ताकत का सबसे बड़ा स्तंभ बनी।
अज्ञानता का कड़वा नतीजा
इतिहास का यह सबक बिल्कुल साफ और कड़ा है। जो लोकतंत्र अपने ही देश की सरकारी शिक्षा व्यवस्था को जानबूझकर बर्बाद करता है, वह कुछ समय के लिए शांत और सवाल न पूछने वाली जनता तो पा सकता है, लेकिन आगे चलकर वह खुद अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार लेता है।
जनता की अज्ञानता से सरकार चलाना थोड़े समय के लिए तो आसान हो सकता है। लेकिन समय बीतने के साथ-साथ यही अज्ञानता समाज में उग्रवाद (Extremism), आपसी नफ़रत, व्यवस्था पर अविश्वास और आखिरकार लोकतंत्र के विनाश का कारण बनती है।
तानाशाहों की सोची-समझी रणनीति
जहाँ एक तरफ लोकतांत्रिक देशों को जनता के विरोध और देश की स्थिरता के बीच एक संतुलन बनाकर चलना पड़ता है, वहीं दूसरी तरफ इतिहास के तानाशाहों का रास्ता बिल्कुल सीधा और आसान रहा है: अपने
देश की जनता को राजनैतिक रूप से कमज़ोर रखो, उन्हें पैसों के लिए खुद पर निर्भर बनाओ और उनकी सोच को टुकड़ों में बाँट दो। बीसवीं सदी का इतिहास हमें इसके कई बड़े उदाहरण देता है।
चिली का उदाहरण (जनरल अगस्तो पिनोशे):
साल 1973 में चिली देश में तख्तापलट करके सत्ता पर कब्ज़ा करने के बाद तानाशाह जनरल अगस्तो पिनोशे ने उच्च शिक्षा (कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज़) के बजट में भारी कटौती कर दी। कॉलेजों में दाखिले सीमित कर दिए गए, सरकारी शिक्षण संस्थाओं को कमज़ोर किया गया और पढ़ाई का पूरा खर्च परिवारों पर डाल दिया गया।
यह सिर्फ पैसों से जुड़ी नीति नहीं थी, बल्कि इसके पीछे एक गहरी चाल थी। चिली की यूनिवर्सिटीज़ हमेशा से राजनैतिक विरोध, मजदूर आंदोलनों और वैचारिक बहसों का मुख्य केंद्र थीं। तानाशाह पिनोशे ने समझदारी से सरकारी शिक्षा को कमज़ोर करके अपने खिलाफ खड़े होने वाले संगठनों की कमर तोड़ दी।
3. जायरे का उदाहरण (मोबुतु सेसे सेको):
मोबुतु सेसे सेको नाम का एक सैन्य अधिकारी साल 1971 से 1997 तक, यानी पूरे 26 सालों तक जायरे (Zaire) देश का इकलौता राष्ट्रपति और तानाशाह बना रहा।
जहाँ एक तरफ उसने खुद देश का पैसा लूटकर लगभग 5 अरब डॉलर की अकूत निजी संपत्ति जमा कर ली, वहीं दूसरी तरफ उसने देश के स्कूलों और विश्वविद्यालयों को पूरी तरह बर्बाद कर दिया।
इसका नतीजा यह हुआ कि गरीबी और लाचारी के दलदल में फंसी वहाँ की जनता के पास न तो इतना समय बचा और न ही इतनी ताकत कि वे सरकार के खिलाफ कोई लंबा आंदोलन चला सकें।
कंबोडिया का सबसे खौफनाक उदाहरण (खमेर रूज और पोल पॉट):
कंबोडिया के तानाशाह पोल पॉट और उसके संगठन 'खमेर रूज' (Khmer Rouge) ने तो अज्ञानता के इस नियम को बेहद डरावनी और क्रूर सीमा तक पहुँचा दिया। इस सरकार को पढ़े-लिखे लोगों पर सिर्फ शक ही नहीं था, बल्कि यह उन्हें पूरी तरह मिटा देना चाहती थी।
वहाँ शिक्षकों, डॉक्टरों, इंजीनियरों, प्रोफेसरों और यहाँ तक कि चश्मा लगाने वाले आम नागरिकों तक को ढूँढ-ढूँढकर मार डाला गया (क्योंकि चश्मा लगाने वाले को पढ़ा-लिखा माना जाता था)।
इस खूनी शासन के पीछे एक खौफनाक सच्चाई छिपी थी: तानाशाह यह अच्छे से जानते थे कि सवाल उठाने वाली सोच ही तानाशाही व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
नाजी जर्मनी और सोवियत संघ का उदाहरण
नाजी जर्मनी (हिटलर के शासन) ने भी यह अच्छे से समझ लिया था कि अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए पढ़ाई-लिखाई पर कब्ज़ा करना कितना ज़रूरी है।
वहाँ विश्वविद्यालयों से आज़ाद सोच वाले प्रोफेसरों को निकाल दिया गया, स्वतंत्र शोध पर पाबंदी लगा दी गई और स्कूल-कॉलेजों के सिलेबस (Curricula) को इस तरह बदल दिया गया कि बच्चों के दिमाग में केवल अपनी नस्ल का घमंड और देश की अंधी भक्ति भरी जा सके।
कोई भी तानाशाह व्यवस्था ऐसे स्वतंत्र कॉलेजों या संस्थाओं को बर्दाश्त नहीं कर सकती जहाँ आज़ाद सोच को बढ़ावा मिले, क्योंकि आज़ाद सोच आगे चलकर गलत के खिलाफ आवाज़ उठाने की हिम्मत देती है।
इसी तरह, स्टालिन के शासन में सोवियत संघ (रूस) ने इसी नियम का एक दूसरा रूप दिखाया। वहाँ पढ़ाई का विस्तार तो बहुत बड़े पैमाने पर किया गया, लेकिन उस पर सरकार का कड़ा पहरा था।
विज्ञान और तकनीक की पढ़ाई को केवल उसी हद तक बढ़ावा दिया गया जहाँ तक वह सरकार और सेना को मजबूत बनाने में काम आए। राजनीति या समाज पर आज़ाद होकर सवाल उठाना वहाँ भी बेहद खतरनाक था।
उस व्यवस्था को केवल काम करने वाले हुनरमंद मजदूर और इंजीनियर चाहिए थे, आज़ाद सोच वाले बुद्धिजीवी नहीं।
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एक महत्वपूर्ण बात:
आज के दौर में भी इस अंतर को समझना बहुत ज़रूरी है। तानाशाह सरकारें पढ़ाई-लिखाई के खिलाफ नहीं होतीं, वे असल में इंसानों के भीतर पैदा होने वाली 'स्वतंत्र और तार्किक सोच' के खिलाफ होती हैं।
2. बिना सेंसरशिप के शिक्षा को कमज़ोर करना
लेकिन, आज के आधुनिक लोकतांत्रिक देश भी इस मामले में पूरी तरह दूध के धुले नहीं हैं। दुनिया में अपनी अच्छी छवि बनाए रखने के लिए बहुत कम लोकतांत्रिक सरकारें खुलेआम पढ़ाई का विरोध करती हैं।
इसके बजाय, आज के दौर में एक नया और छिपा हुआ खतरा सामने आया है—शिक्षा को केवल पैसा कमाने का एक ज़रिया बना देना और उसके भीतर से समाज सुधार की भावना को पूरी तरह गायब कर देना।
महँगी फीस और आलीशान-चमकदार इमारतें आज के समय में पढ़ाई को एक महँगा सौदा बनाने का जरिया बन चुकी हैं। कई लोकतांत्रिक देशों में कॉलेज और यूनिवर्सिटीज़ अब केवल 'डिग्री बाँटने वाले कारखाने' (Credential factories) बनकर रह गए हैं।
उनका पूरा ध्यान पढ़ाई के असली स्तर के बजाय अपनी ब्रांडिंग (दिखावे) पर होता है। उन्हें ऐसे लोग तैयार करने हैं जो कंपनियों में जाकर चुपचाप 'व्हाइट कॉलर' (दफ्तर की) नौकरी कर सकें, न कि ऐसे नागरिक जो राजनीति और समाज के सही-गलत को समझकर सवाल उठाएँ।
ध्यान भटकाने का चक्रव्यूह
आज हमारा सार्वजनिक जीवन और आपसी बहसें पूरी तरह इंटरनेट के मनोरंजन वाले एल्गोरिदम (Algorithms), टीवी चैनलों पर टीआरपी (TRP) के लिए होने वाली शोर-शराबे वाली बहसों, सोशल मीडिया के गुस्से और लोगों का ध्यान भटकाने वाली चीज़ों से घिर चुकी हैं।
इसके कारण किसी भी गंभीर मुद्दे पर गहराई से सोचने की क्षमता कमज़ोर हो जाती है। नतीजा यह है कि आज के नागरिकों के पास बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ तो हो सकती हैं, लेकिन उनके पास इतिहास की सही समझ, गहरी सोच या देश की व्यवस्था को समझने की सूझबूझ नहीं होती।
बिना पाबंदी के सोच को कमज़ोर करने का नया तरीका
यह स्थिति लोकतंत्र के भीतर एक बहुत ही छिपी हुई और बारीक कमज़ोरी पैदा करती है। आज की आधुनिक सरकारें आपकी आज़ाद और तार्किक सोच को दबाने के लिए खुलेआम पाबंदियाँ (Censorship) नहीं लगातीं। इसके बजाय, वे इसे इन तरीकों से धीरे-धीरे कमज़ोर कर देती हैं:
बाज़ारीकरण (Commercialization): पढ़ाई को पूरी तरह फायदे और मुनाफे का धंधा बनाकर,
निजीकरण (Privatization): सरकारी संस्थाओं को कमज़ोर करके सब कुछ प्राइवेट हाथों में सौंपकर,
मीडिया का ओवरलोड (Media overload): टीवी और इंटरनेट पर इतनी ज़्यादा फालतू जानकारियों की बाढ़ ला देना कि इंसान असली और नकली में फर्क न कर पाए,
शिक्षा में बढ़ती असमानता: अमीरों के लिए बहुत अच्छी और गरीबों के लिए बेहद सामान्य शिक्षा होना,
बचपन के अधिकार के नाम पर आसान पढ़ाई: बच्चों पर तनाव कम करने या 'बचपन के अधिकार' के नाम पर पढ़ाई और परीक्षाओं के स्तर को इतना हल्का कर देना कि बच्चे गहराई से सोचना ही न सीखें, और
नागरिकों को केवल ग्राहक (Consumer) बना देना: लोगों की सोच को देश के विकास से हटाकर केवल सामान खरीदने और उपभोग करने तक सीमित कर देना।
इसका राजनैतिक नतीजा बहुत बड़ा होता है। जब देश की जनता लगातार चलने वाले मनोरंजन और तमाशे में खोई रहती है, तो सरकारों के लिए उनके दिमाग से खेलना बहुत आसान हो जाता है, और इसके लिए सरकारों को डंडे या जेल का इस्तेमाल भी नहीं करना पड़ता।
दो हज़ार साल पुरानी कड़वी हकीकत
रोम के एक प्रसिद्ध कवि जुवेनल (Juvenal) ने लगभग दो हज़ार साल पहले इस चालाकी को "ब्रेड एंड सर्कस" (रोटी और मदारी का खेल) कहा था।
उनके अनुसार, अगर कोई सरकार अपनी जनता का ध्यान देश की नीतियों और सरकार के कामों की जाँच करने से भटकाना चाहती है, तो उसे बस दो काम करने होंगे: जनता को ज़िंदा रहने के लिए मुफ्त का बुनियादी राशन (रोटी) दे दो और उनका मनोरंजन करने के लिए लगातार टीवी, सोशल मीडिया या तमाशे में उलझाए रखो।
आज के आधुनिक लोकतंत्रों में भी यह खतरा तेज़ी से बढ़ रहा है। सरकारें असली नागरिक शिक्षा (Civic education) देने के बजाय लोगों को डिजिटल मनोरंजन के चक्रव्यूह में फंसा रही हैं और कुछ बुनियादी भत्ते या मुफ्त योजनाएँ दे रही हैं, ताकि जनता सरकार की नीतियों पर कभी गहराई से सवाल न उठाए।
यह तनाव हमेशा बना रहेगा
इतिहास का यह गहरा सबक व्यवस्था के खिलाफ खड़े होने वाले बागियों और सरकार का बचाव करने वाले दोनों के लिए ही बहुत असहज करने वाला है।
बिल्कुल साफ बात यह है कि:
लोकतंत्र को ज़िंदा रखने के लिए हर हाल में पढ़े-लिखे और जागरूक नागरिकों की ज़रूरत होती है।
लेकिन, तानाशाह सोच रखने वाली सरकारें, बड़ी-बड़ी महत्वाकांक्षी कंपनियाँ (Corporations) और खुद को भगवान समझने वाले नेता हमेशा ऐसे नागरिकों से डरते हैं जो बिना किसी के बहकावे में आए आज़ाद और स्वतंत्र सोच रख सकते हैं।
यह तनाव कभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हो सकता। यह पूरी तरह से लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक हिस्सा ही है।
..... समाप्त
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