क्या विज्ञापन बनावटी दुनिया बना रहा है?
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क्या विज्ञापन बनावटी दुनिया बना रहा है?
Is Advertisement Creating Fake World? का हिन्दी रूपांतर एवं सम्पादन
~ सोनू बिष्ट
विज्ञापन ने मार्केटिंग रणनीति के बारे में हमारे सोचने के तरीके में क्रांति ला दी है। यह दुनिया भर के व्यवसायों के लिए उनकी सफलता को गति दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
यह कोई रहस्य नहीं है कि, विज्ञापन अक्सर झूठ बोलते हैं और उत्पादों को अधिक आकर्षक बनाने के लिए झूठी कहानियां बनाते हैं। यह झूठ का उद्योग है। विज्ञापन में तथ्य शायद ही अपनी जगह पाते हैं।
अतिशयोक्ति पहली नज़र में प्रभावी हो सकती है किन्तु, बेचे जा रहे उत्पाद की वास्तविकता को नहीं दर्शाती । यह सटीक जानकारी प्रदान नहीं करता है जिसकी आवश्यकता किसी को उत्पाद के बारे में विचारपूर्ण निर्णय लेने के लिए पड़ सकती है।
अतः, दर्शकों को ठगने और गुमराह करने की उनकी शक्ति के कारण ही विज्ञापन का उपयोग जोड़-तोड़ के लिए किया जाता है।
विज्ञापन उद्योग झूठ को तथ्यों के रूप में प्रस्तुत करता है और संभावित खरीददारों के लिए एक अवास्तविक सपने का सृजन करता है।
तथ्यों और कल्पनाओं के बीच की रेखा को धुंधला कर देना, विज्ञापनों को परियों की कहानी के समान विशेषताएं देता हैं। प्रेरक संदेश अक्सर सत्य पर वरीयता ले लेता है। यह दावा निश्चित रूप से निराधार नहीं है।
विज्ञापनों का प्रारूप स्वाभाविक रूप से एक विशेष प्रकार का ध्यान आकर्षित करने या कुछ भावनाओं को जगाने और वास्तविकता का एक आदर्श संस्करण बनाने के लिए ही किया गया है।
यह संभावना की सीमाओं से परे बेतहाशा भागता है। कोई संदेश कितना भी प्रेरक क्यों न हो किंतु, वह अंततः किसी उत्पाद को बेचने के लिए झूठ और कोरी कल्पना पर ही निर्भर करता है।
परियों की कहानियों के रूप में खुद को दिखाना विज्ञापनों के पीछे का मूल आधार है।
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प्रेरक संदेश अक्सर सत्य पर वरीयता ले लेता है
अनुनयन रणनीति लोगों को सुरक्षा की झूठी भावना में डाल सकती है, जो उनका निर्णय करने के लिए मार्गदर्शन कर सकती है और जिसका बाद में उन्हें पछतावा भी हो सकता है।
ज्यादा से ज्यादा, एक विज्ञापन को लोगों को सच्चाई से अवगत करना चाहिए और पूरी जानकारी प्रदान करनी चाहिए बिना कोई ऐसे वादे किए जिन्हें पूरा नहीं किया जा सकता । फिर भी, वास्तव में, विज्ञापन अक्सर सच्चाई से बहुत दूर होते हैं और एक परी कथा का रूप ले लेते हैं।
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गूगल (Google) सबसे प्रमुख विज्ञापन प्रबंधकों में से एक है
उड़ने वाली कारें, रूप परिवर्तन करने वाले सौंदर्य प्रसाधन, सुपरफूड्स (विशेष खाद्य पदार्थ), फैशन के कपड़ों को सुंदर बनाना और यहां तक कि, धर्मार्थ (परोपकारी) अनुरोधों को देवदूत बनाना कुछ भ्रांतिमूलक विज्ञापन सामग्रियां हैं।
अपने शब्दों और दृश्यों का ध्यानपूर्वक चयन करके, विज्ञापन कंपनियाँ अपने द्वारा बेचे जा रहे उत्पाद की सटीक तस्वीर को समझने के लिए आवश्यक किसी भी तथ्यात्मक जानकारी को छिपा सकती हैं।
दुर्भाग्य से, इसका मतलब यह है कि, विज्ञापनदाता उपभोक्ताओं को उनके उत्पादों के बारे में वास्तविकता के बिल्कुल विपरीत प्रभाव दे सकते हैं।
विज्ञापन कई चैनलों और रणनीतियों को शामिल करने के लिए विकसित हुआ है, जिससे यह काफी राजस्व वाला एक बड़ा उद्योग बन गया है।
इसके अलावा, विज्ञापन वास्तविकता का एक आदर्श संस्करण बनाने की अपनी क्षमता में अविश्वसनीय रूप से परिष्कृत हो गए हैं।
उदाहरण के लिए, वे अक्सर झूठे वादे करते हैं जो, एक स्वस्थ जीवन शैली को बढ़ावा देते है जबकि, वह अस्वास्थ्यकर उत्पादों के साथ लोगों को लुभा रहे होते है।
वास्तविकता के एक झूठे ढाँचे का निर्माण करते हुए, विज्ञापन के वित्तीय और मनोवैज्ञानिक परिणाम हो सकते हैं।
विज्ञापनों के मनोवैज्ञानिक रूप से कुछ गंभीर परिणाम हो सकते हैं, विशेषकर युवा लोगों और महिलाओं के लिए।
अनुसंधान ने प्रमाणित किया है कि, विज्ञापन अक्सर सामान्य असुरक्षा की ओर संकेत करता है और सार्थक लक्ष्यों का पीछा करने की दिशा में नकारात्मक आत्मबोध को बढ़ाता है।
कई अध्ययनों से पता चला है कि, विज्ञापनों में प्रदर्शित की जाने वाली सतही छवियां उन लोगों में अपर्याप्तता की भावना पैदा कर सकती हैं, जिनके पास उन चीज़ों की कमी है जो विज्ञापित की गई है।
इस प्रकार, विज्ञापन में हमारे दृष्टिकोण और दूसरों के दृष्टिकोण को आकार देने की क्षमता है। जबकि, इसकी प्रेरक शक्ति के संभावित परिणाम अस्वास्थ्यकर विकल्पों के रूप में हो सकते है।
अक्सर यह तर्क दिया जाता रहा है कि, विज्ञापन बहुत सम्मोहक होता है। इस वजह से उपभोक्ताओं को लगता है कि, उन्हें कुछ खरीदने की जरूरत है, समाज मे स्वीकार किए जाने या खुश होने के लिए।
परिणामस्वरूप, यह अत्यधिक नुकसान-देह परिणाम पैदा कर सकता है; स्वयं की और वास्तविकता की यह विषम धारणा विज्ञापन के कई संभावित दुष्प्रभावों में से एक है।
यह विषमता महत्वपूर्ण नुकसान उत्पन्न कर सकती है, जैसे विकृत शरीर की छवि और आत्म-छवि में कमी, जो उत्कंठा (Anxiety) की ओर ले जा सकती है।
इसके अतिरिक्त, विज्ञापन का अक्सर आत्म-सम्मान पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। अवास्तविक सौंदर्य मानकों को कायम रखा जाता है, ये "मानक" मानसिक दबाव और अवास्तविक तुलनाओं का निर्माण करते हैं।
भव्य जीवन शैली को चित्रित करते हुए सबसे बढ़िया मॉडल्स ( कलाकारों) को दिखाने वाले नियमित विज्ञापन एक अप्राप्य जीवन लक्ष्य बना सकते हैं। दुर्भाग्य से, तम्बाकू उद्योग इस आकर्षण का उपयोग कर रहा है।
अध्ययनों से संकेत मिलता है कि, विज्ञापन लोगों के खरीद निर्णयों को प्रभावित करता है और उन निर्णयों से वित्तीय कठिनाई भी हो सकती है।
विज्ञापनों के असर को समझना आवश्यक है, एक जानकार उपभोक्ता बनने के लिए जो कि,उनके संभावित हानिकारक प्रभावों से प्रभावित नही होता।
अध्ययनों से पता चला है कि, विज्ञापनों के परिणामस्वरूप अवास्तविक उम्मीदें पैदा हो सकती हैं और वास्तविकता को कल्पना से अलग करने में एक असमर्थता उत्पन्न हो सकती है।
इसके अतिरिक्त, विज्ञापन अक्सर लोगों की गहरी इच्छाओं या डर पर उन्हें झांसा देता है और पैसा खर्च करने के लिए राजी कर लेता हैं, जिसके हानिकारक परिणाम हो सकते हैं यदि, वह ठीक से प्रबंधित ना हो ।
जब विज्ञापन की भाषा को अंकित मूल्य पर लिया जाता है तो, अत्यधिक खर्च की कहानियां दुःखद रूप से बहुत आम होती हैं।
विज्ञापन उद्योग एक विशाल आर्थिक मशीन है और उपभोक्ताओं को अपने बटुए पर इसके प्रभाव के बारे में पता होना चाहिए। आधुनिक घर उन सामानों से भरे पड़े हैं जिनकी आवश्यकता ही नहीं है।
व्यर्थ के खर्च और अवांछित वस्तुओं का होना आवेगपूर्ण खरीदारी के परिणाम है, जो विज्ञापन के दिमागी खेल से अत्यधिक प्रभावित होते है।
समाज पर इसके प्रभाव की जिम्मेदारी किसे लेनी चाहिए जब एक पूरा उद्योग मौजूदा व्यक्तिगत कमजोरियों के दोहन पर निर्भर है?
अगर विज्ञापन कंपनियाँ इस भ्रामक काल्पनिक दुनिया का निर्माण करती रहीं, तो आधे सच और झूठ पर विश्वास करना सामान्य हो जाएगा।
हम एक ऐसी नींव पर समाज का निर्माण क्यों करना चाहते हैं जो, मूलभूत रूप से मौजूद नहीं है?
विज्ञापन का प्रभाव समाज के उन हिस्सों में फैल गया है जो, सबसे ज्यादा मायने रखते हैं। जब समाचार रिपोर्टिंग को "पेड न्यूज़" (paid news) के रूप में विरूपित किया जाता है तो, यह खतरनाक होता है।
लोकतंत्र अब भयावह हो गया है क्योंकि, उसने मतदाताओं को लुभाने के लिए विज्ञापन उद्योग की रणनीतियों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है।
प्रतिबद्धताएं, जो बुनियादी तौर पर बाध्यकारी होनी चाहिए, सपनों की तरह दर्शायी जाती हैं। एक कार्यकाल के अंत में, मतदाता अपनी इच्छाओं को खो देते हैं क्योंकि प्रतिज्ञाएँ पहले स्थान पर ही काल्पनिक थीं।
यह केवल व्यक्ति ही नहीं होता जो विज्ञापनों से प्रभावित होकर निर्णयों को खरीदता है बल्कि, राष्ट्रीय नीतियां भी इससे प्रभावित होती है।
नकली दुनिया में रहना अपरिहार्य हो गया है, यह जानते हुए भी कि, विज्ञापन गलत और काल्पनिक हैं।
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यूट्यूब पर 5.1 करोड़ चैनल और 10 लाख से अधिक सदस्यों के साथ 29,000 चैनल हैं
यदि कोई व्यक्ति एक घंटे के लिए टेलीविजन देखता है, तो वहां पर 25% समय के लिए विज्ञापन होते हैं। इस अवधि के माध्यम से, दर्शक मानसिक रूप से व्यावसायिक सामग्री को झूठा, काल्पनिक, अर्ध-सत्य या चालाक के रूप में चुनौती देता है।
कई पत्रिकाओं में उनकी सामग्री का दो- तिहाई भाग या तो विज्ञापन या सशुल्क उत्पाद प्लेसमेंट (paid product placement) के रूप में होता है।
एक समाज के रूप में, यह हर उस चीज़ के बारे में संदेह करने की आदत विकसित कर रहा है जिसे देखा या पढ़ा जा रहा है। जमाखोरी के साथ भी यही सिंड्रोम (Syndrome) है।
विज्ञापन की युक्तियों का उपयोग धर्म और संप्रदाय के प्रचार में किया जाता है। अनभिज्ञ जनता के लिए वही काल्पनिक अवास्तविक वादे प्रसारित किए जाते हैं।
धार्मिक समूह और संप्रदाय के नेता भावनात्मक अपील का उपयोग करके और व्यक्तिगत अपर्याप्तता को उजागर करके बड़े पैमाने पर अनुसरणकर्ता की भीड़ इकट्ठी कर सकते हैं।
असरदार विज्ञापन के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले साधनों का इस्तेमाल आस्था बेचने के लिए किया जाता है। यह खतरनाक है क्योंकि, उस स्थिति में यह समाज के उस हिस्से में प्रवेश कर रहा है जो, सामाजिक ताने-बाने और संस्कृति को प्रभावित करता है।
किंतु, सुविधानुसार, उन्हें एक आवश्यक बुराई का नाम दिया जा सकता है। क्यों?
इस आधुनिक युग में कई नवाचार 'गूगल' (Google) जैसी कंपनियों से आए हैं। एक कंपनी के रूप में, वे नवाचार को चलाने के लिए अपने प्राथमिक स्रोत के रूप में विज्ञापन राजस्व का उपयोग कर रहे हैं।
यदि यह विज्ञापन के लिए नहीं होगा तो, गूगल वहाँ पर नहीं होगा।
2019 में 50 हजार करोड़ डॉलर (लगभग रु 40 लाख करोड़) से अधिक के अनुमानित राजस्व के साथ, विज्ञापन उद्योग वैश्विक अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता आ रहा है।
'गूगल' (Google) सबसे प्रमुख विज्ञापन प्रबंधकों में से एक है। इसकी शुरूआत के बाद से ही, यह विज्ञापन मंचों पर हावी हो गया और विज्ञापन राजस्व से भारी मुनाफा कमा रहा है।
इसके अलावा, विज्ञापन राजस्व के माध्यम से, यह $ 85,500 करोड़ के विशाल पूंजीकरण के साथ सबसे बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों में से एक बना रहा। इन सभी आँकड़ों और तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि, गूगल (Google) का विज्ञापन राजस्व अन्य सभी प्रतिस्पर्धियों के ऊपर शीर्ष पर बना हुआ है।
गूगल (Google) और फेसबुक (Facebook) की तरह, लाखों व्यापार, उत्पाद प्लेसमेंट से होने वाली आय के साथ जीवित रहते हैं। न केवल उन्हें विज्ञापनों से लाभ होता है, बल्कि, वे लाखों अन्य इच्छुक लोगों को वैश्विक विज्ञापन राजस्व का हिस्सा प्राप्त करने के मार्ग भी प्रदान करते हैं।
आज, विज्ञापन राजस्व एक घरेलू आय स्रोत है, इसका पूरा श्रेय यूट्यूब (YouTube) जैसे सोशल मीडिया मंचों को जाता है। यूट्यूब पर 5.1 करोड़ चैनल और 10 लाख से अधिक सदस्यों के साथ 29,000 चैनल हैं।
सोशल मीडिया उद्योग, जो अब आधुनिक युग के मानव डीएनए (DNA) का हिस्सा है, विज्ञापन राजस्व द्वारा ऑक्सीजन युक्त है।
अतः, विज्ञापन उद्योग को समाज पर इसके प्रभाव की जिम्मेदारी लेनी चाहिए और अधिक स्थायी दृष्टिकोणों पर विचार करना चाहिए जो व्यक्तिगत कमजोरियों का फायदा नहीं उठाते।
दुनिया विज्ञापनों के बिना गुजारा नहीं कर पाएगी, चाहे वे सच्चाई से कितने भी दूर क्यों न हों। ग्राहक तक पहुँचने के एक तरीके के रूप में, विज्ञापन बुरा नहीं है, बस इसकी सामग्री संदिग्ध है।
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