भारतीय मीडिया - विश्व नेतृत्व - गाजा त्रासदी
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भारतीय मीडिया - विश्व नेतृत्व - गाजा त्रासदी
Indian Media - World Leadership - Gaza Tragedy का हिन्दी रूपांतर एवं सम्पादन
~ सोनू बिष्ट
भारतीय मीडिया ने गाजा - इजरायल संघर्ष को किस प्रकार से पेश किया है, इसकी भूलभुलैया स्पष्टता की मांग करती है।
7 अक्टूबर की अपनी एक कड़वी हकीकत है . हमास ने जो किया वह भयानक था इससे इन्कार नही किया जा सकता और वह स्पष्ट रूप से तिरस्कार का हकदार है।
उसी समय में, गाजा में इजरायली सेना की कार्रवाई भी उतनी ही निंदनीय और शोचनीय है, जो हमारी मानवता को परिभाषित करने वाले मानदंडों का उल्लंघन करती है।
इस वैश्विक तमाशे में, एक संयमित फुटबॉल मैच के समान, हम खुद को हताहतों की गिनती करते हुए पाते हैं: 1400 इजरायली बनाम 14,000 फिलिस्तीनी।
दुःख प्रत्यक्ष है और हमारे विश्व के नेताओं के लिए यह शर्म की बात है। चर्चाओं को शांति की ओर ले जाने और सात दशकों के संघर्ष को समाप्त करने के बजाय, नेता ध्रुवीकरण में उलझे हुए हैं।
अमेरिका, ब्रिटेन और भारत इजरायल समर्थक हैं, जबकि अन्य, इसकी ओर अधिक तटस्थ रुख अपनाते हैं।
जैसा कि पूर्वानुमान है, अरब और इस्लामी देश इजरायली कार्रवाई का विरोध करते हैं, हालांकि सर्वसम्मति से वह हमास का समर्थन भी नहीं करते हैं।
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हमास (Hamas) गाजा में एक निर्वाचित और वैध सरकार है
बारीकियों की जांच की जाएं तो, सभी मुसलमान हमास और उसके कार्यों का समर्थन नहीं करते, जैसे सभी यहूदी, इजरायली, बदला लेने वाले हमलों का समर्थन नहीं करते हैं।
कुछ लोगों का तर्क है कि यहूदी नरसंहार इतिहास के अनुभव ने, गाजा में वर्तमान इजरायली हमले को आक्रामक बना दिया है।
भारत का ऐतिहासिक रुख ध्यान देने योग्य है. 1947 में, यह उन कुछ गैर-अरब देशों में से था जिन्होंने, फिलिस्तीन के विभाजन के खिलाफ मतदान किया था।
इस सन्दर्भ में इतिहास के एक आवश्यक अंश का उल्लेख आवश्यक है।
1947 में फ़िलिस्तीन के विभाजन के पक्ष में, मतदान न करने का भारत का निर्णय, आंतरिक और बाह्य दोनों तरफ से विभिन्न कारकों से प्रभावित था।
ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से आजादी के लिए भारत के संघर्ष के दौरान, दुनिया भर में उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों के साथ, एकजुटता की मजबूत भावना थी।
जवाहरलाल नेहरू जैसी शख्सियतों की अगुआई में भारतीय नेतृत्व ने फिलिस्तीन सहित विभिन्न उपनिवेशित देशों की राष्ट्रवादी आकांक्षाओं का समर्थन किया।
उन्होंने ( भारत ने ) इज़राइल के निर्माण को संभावित रूप से उपनिवेशवादी प्रवृत्तियों के अनुरूप देखा ।
नव स्वतंत्र भारत के नेतृत्व को फ़िलिस्तीन में एक * आबादकार राज्य (Settler state) की स्थापना के बारे में सोचकर आपत्ति थी।
ब्रिटिश उपनिवेशीकरण के अनुभव से उपजी बेचैनी के कारण दुनिया के दूसरे हिस्से में समान तरह के मॉडल का समर्थन करने के लिए यह भारत को अनिच्छा की ओर ले गया।
1947 में, भारत ने, यहूदी अल्पसंख्यकों के लिए संवैधानिक सुरक्षा उपायों के साथ फिलिस्तीन के एक स्वतंत्र संघीय राज्य के रुप में निर्माण के लिए, एक वैकल्पिक योजना का प्रस्ताव रखा।
यह प्रस्ताव क्षेत्र के सभी समुदायों की चिंताओं को दूर करने वाला एक समाधान खोजने की, भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
भारत के उत्तर-औपनिवेशिक (Post-colonial) राष्ट्रवादी बुद्धिजीवी वर्ग, उन निर्णयों को लेकर सतर्क थे, जिनकी व्याख्या औपनिवेशिक शक्तियों के साथ सम्मिलित हो जाने के रूप में की जा सकती थी।
डर यह था कि विभाजन का समर्थन करना ब्रिटिश साम्राज्यवादी कार्यों का एक अनुमोदन माना जा सकता है।
उस समय के भू-राजनीतिक परिदृश्य ने भी , इसपर प्रभाव डाला। भारत एक व्यापक उपनिवेशवाद-विरोधी आंदोलन (anti-colonial movement), का हिस्सा था, और शीत युद्ध (Cold war ) ने वैश्विक गठबंधनों को आकार देना शुरू कर दिया था।
इन कारकों ने फिलिस्तीन के विभाजन सहित, अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर भारत के रुख को प्रभावित किया।
यह समझना आवश्यक है कि भारत का निर्णय, उसके विशिष्ट ऐतिहासिक संदर्भ, राष्ट्र-निर्माण और उपनिवेशवाद-विरोधी भाव के अत्यंत महत्वपूर्ण दौर के दौरान, उसकी विदेश नीति को मार्गदर्शित करने वाले सिद्धांतों में निहित था।
वर्तमान स्थिति की तुलना अतीत से करे तो , हम वैश्विक नेतृत्व को चुनाव संबंधी, विचार- विमर्श में, असमर्थ होते हुए देख रहे हैं। अगले साल ब्रिटिश चुनाव हैं और मौजूदा सरकार पहले से ही, अपनी स्थिति बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रही है।
अमेरिकी चुनाव अभी एक साल दूर हैं, और ट्रम्प पहले से ही चुनाव का नेतृत्व कर रहे हैं। भारतीय राष्ट्रीय चुनाव सिर्फ छह महीने दूर हैं। इस चुनाव के नतीजे से अपेक्षित है कि यह भारतीय धर्मनिरपेक्ष राजनीति की राह में प्रचंड बदलाव लाएगा ।
एक और उल्लेखनीय और चल रही चर्चा, यह मानती है कि दुनिया गाजा में घट रही घटनाओं को किस दृष्टिकोण से देखती है। यह सवाल कि, क्या हमास एक "आतंकवादी" संगठन है, निरंतर बहस का विषय है।
इसके बावजूद, हमास (Hamas) गाजा में एक निर्वाचित और वैध सरकार है, हालांकि, एक निराशाजनक अनुमोदन रेटिंग (approval rating) के साथ।
इज़राइल के पास भी एक वैध सरकार है, किन्तु , 7 अक्टूबर को हमास के हमले से पहले भी वह अशांति की स्थिति में था और आंतरिक कलह का सामना कर रहा था।
प्रधान मंत्री नेतन्याहू (Netanyahu) के विवादास्पद न्यायिक सुधार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन ने उन्हें खराब अनुमोदन रेटिंग दी।
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संयुक्त राष्ट्र (UN) अप्रभावी लगता है ,और आशा जगाने वाले किसी विश्व नेता की अनुपस्थिति निराशा को और बढ़ा देती है
इसलिए, यह निष्कर्ष निकालना सही होगा कि, मध्य पूर्व, वर्तमान में खराब अनुमोदन रेटिंग वाली वैध सरकारों द्वारा लड़े जा रहे, सशस्त्र संघर्ष के बीच फंसा हुआ है, दुर्भाग्य से, दोनों तरफ से मौतों की संख्या हजारों में हैं।
गाजा एक लाशों के ढेर से भरा कब्रिस्तान बन गया है और इजराइल गंभीर बंधक संकट से जूझ रहा है, दुनिया इसे लाइव और रोजाना देखती है।
इस यथार्थवाद की गंभीरता से मुक्त होना, इतिहास के एक और हिंसक अध्याय के लेखन को रोकना, एक अनिश्चित चुनौती बनी हुई है।
संयुक्त राष्ट्र (UN) अप्रभावी लगता है, और आशा जगाने वाले किसी विश्व नेता की अनुपस्थिति निराशा को और बढ़ा देती है। विश्व के नेता ध्रुवीकृत होकर खड़े हैं।
इस पृष्ठभूमि में, विश्व शांति, मानवाधिकारों, अंतर्राष्ट्रीय समझौतों और उपनिवेशीकरण को संबोधित करने वाली एक समय में प्रासंगिक राजनीतिज्ञता अप्रचलित और अछूती दिखाई देती है।
भारतीय संदर्भ में एक अलग ही तरह का युद्ध जगह ले रहा है. मीडिया ने गाजा संघर्ष को विस्तार देकर, एक * सूचना-युद्ध (Info- war) में बदल दिया है।
इसमें वर्तमान घटनाओं और इतिहास को अव्यवसायिक तरीके से मिश्रित किया गया है, यहां तक कि 7 अक्टूबर के हमास हमले और मुंबई में 26/11 को हुए जघन्य आतंकवादी हमले के बीच समानताएं दर्शाने की हद तक जा रहा है।
यह विवरण मुसलमानों को भारत में एक ख़तरे के रूप में, चित्रित करता है और उसकी तुलना इसराइल में जैसे हमास है, उस तरह करता है ।
यह न सिर्फ बेतुका है बल्कि बेहद गैरजिम्मेदाराना भी है।
जिस तरह से हम इस सूचना परिदृश्य में चल रहे हैं, आइए सतर्क हो जाएं, भारतीय मीडिया द्वारा मुद्दों के खतरनाक मिश्रण से।
जैसे - आतंक का इस्लामीकरण, राष्ट्रवाद, मुस्लिम, हिंदू, फिलिस्तीन समर्थक, इजरायल समर्थक भावनाएं - ये सभी राज्य और राष्ट्रीय चुनाव की अगुवाई में आपस में जुड़े हुए हैं।
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कुछ आउटलेट्स का तो यहां तक दावा है कि, इजराइल भारत का युद्ध लड़ रहा है
जल्द ही होने वाले राष्ट्रीय चुनावों ने मीडिया पक्षपात को और अधिक बढ़ा दिया है, कुछ आउटलेट्स का तो यहां तक दावा है कि, इजराइल भारत का युद्ध लड़ रहा है।
भारत में मुसलमानों और हमास के बीच संबंध जोड़ने का प्रयास कर रहा है, यह विवरण पहले से ही व्याप्त जटिल वास्तविकता को और अधिक धुँधला कर देता है।
ऐसा प्रतीत होता है कि विश्व शांति, मानवाधिकार और अंतर्राष्ट्रीय समझौतों जैसे महत्वपूर्ण मामलों पर लोकलुभावनवाद (Populism) हावी हो गया है।
भारत जैसी विशाल आबादी का असंतुलित परिप्रेक्ष्य बनाना जोखिम भरा है और संभावित रूप से इतिहास की दिशा बदल सकता है।
घटनाओं के प्रति दृष्टिकोण और उन घटनाओं की रिपोर्ट करना दोनों ही गंभीर प्रतीत होते हैं, लेकिन आइए आशा करें कि यह वैसा सामने नहीं आएगा जैसा दिखता है।
* आबादकार राज्य, संप्रभु राज्य हैं जो प्रवासी बाशिंदों द्वारा उपनिवेशित किए गए थे जिनके वंशज स्वदेशी लोगों पर राजनीतिक रूप से प्रभुत्व रखते हैं।
* सूचना युद्ध ( आईडब्ल्यू ) एक अवधारणा है जिसमें प्रतिद्वंद्वी पर प्रतिस्पर्धात्मक लाभ की खोज में सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) के युद्धक्षेत्र उपयोग और प्रबंधन शामिल है ।
सूचना युद्ध लक्ष्य की जागरूकता के बिना एक लक्ष्य द्वारा विश्वसनीय जानकारी का हेरफेर है ताकि लक्ष्य उनके हित के खिलाफ निर्णय ले, लेकिन सूचना युद्ध का संचालन करने वाले के हित में।
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