मिखाइल गोर्बाचेव: प्रसिद्ध और विवादास्पद
SUBSCRIBE to Support Independent JournalismToday
मिखाइल गोर्बाचेव: प्रसिद्ध और विवादास्पद
Mikhail Gorbachev: Legendary and Controversial का हिन्दी रूपांतर एवं सम्पादन
~ सोनू बिष्ट
मिखाइल गोर्बाचेव (1931-2022) एक दूरदर्शी नेता थे और उन्होंने शीत युद्ध को समाप्त करने में मदद की। परिणामस्वरूप, उन्हें इतिहास में एक प्रसिद्ध व्यक्ति के रूप में याद किया जाएगा।
यद्यपि, शीत युद्ध अंत में, बिना किसी बड़े संघर्ष के समाप्त हो गया किन्तु, गोर्बाचेव के नेतृत्व ने इसकी विफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मिखाइल गोर्बाचेव का जन्म 1931 में सोवियत संघ में हुआ था। 1952 में वह कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुए और कई पदों के माध्यम से तेजी से ऊपर उठे। 1985 में वह कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव और 1988 में सोवियत संघ के अध्यक्ष बने।
अक्टूबर 1990 में, उन्हें, नोबेल (Nobel) शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। हालाँकि, कम्युनिस्ट पार्टी को लोकतांत्रिक बनाने के उनके प्रयास ने पार्टी के भीतर सत्ता संघर्ष को जन्म दिया।
1991 में कट्टरपंथी कम्युनिस्टों द्वारा तख्तापलट के प्रयास से गोर्बाचेव को अंततः पद से हटा दिया गया था और 30 अगस्त, 2022 को उनका निधन हो गया।
सोवियत-अफगान वापसी
उनकी विरासत के सबसे विवादास्पद पहलुओं में से एक अफगानिस्तान से सोवियत सैनिकों को वापस लेने का उनका निर्णय है। 1979 में अफगानिस्तान पर सोवियत आक्रमण अत्यधिक अलोकप्रिय था।
“
तालिबान शासन की विशेषता थी क्रूरता और असहिष्णुता और जल्द ही यह अल-कायदा( Al-Qaeda) जैसे आतंकवादियों के लिए प्रजनन स्थल बन गया।
1980 दशक के मध्य तक, सोवियत संघ एक महंगे युद्ध में उलझा हुआ था जिसके, खत्म होने के कोई आसार नही थे।
पश्चिम के साथ तनाव कम करने और घरेलू मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए, गोर्बाचेव ने 1988 में अफगानिस्तान से सोवियत सैनिकों को वापस लेना शुरू किया। इस समय तक, सोवियत-अफगान युद्ध लगभग एक दशक से जारी था।
हालांकि, वापसी एक विवादास्पद कदम साबित हुई और इसने अफगान सरकार को गृहयुद्ध की चपेट में लाकर छोड़ दिया। अफगान सरकार जल्दी ही गिर गई और देश गृहयुद्ध में उतर गया।
तालिबान एक शक्तिशाली ताकत के रूप में उभरा और 1996 में उन्होंने काबुल पर अधिकार कर लिया। तालिबान शासन की विशेषता थी क्रूरता और असहिष्णुता और जल्द ही यह अल-कायदा( Al-Qaeda) जैसे आतंकवादियों के लिए प्रजनन स्थल बन गया।
एक दूरगामी प्रभाव में, सोवियत वापसी के साथ जो कुछ शुरू हुआ। उसमें, अफगानिस्तान ने 11 सितंबर के हमलों, इराक और अफगानिस्तान में हिंसक युग के साथ दुनिया के इतिहास को बदल दिया और वैश्विक आतंकवाद को अगले 20 वर्षों के लिए ऊपर उठा दिया ।
वापसी का यह निर्णय कई रूसी प्रतिनिधियों के साथ अत्यधिक अलोकप्रिय साबित हुआ और इतिहासकारों के बीच अभी भी इस पर बहस जारी है। हालाँकि, कई इतिहासकारों का मानना है कि, सोवियत संघ के टूटने में अफगानिस्तान से सोवियत वापसी एक महत्वपूर्ण कारक थी।
दूसरों का कहना है कि, गोर्बाचेव के कार्यों के बावजूद सोवियत संघ अफगानिस्तान में दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम के साथ विफल हो जाता और इसलिए उसकी वापसी ने रूसी प्रतिनिधियों की जान बचाई और सोवियत संघ की प्रतिष्ठा को और अधिक नुकसान होने से रोका।
शीत युद्ध का अंत
सोवियत संघ के अंतिम नेता मिखाइल गोर्बाचेव को अक्सर शीत युद्ध को समाप्त करने में मदद करने का श्रेय दिया जाता है। सोवियत नेता के रूप में, उन्होंने, कई सुधारों को लागू किया जिन्हें, ग्लासनोस्ट (खुलेपन) और पेरेस्त्रोइका (पुनर्गठन) के रूप में जाना जाने लगा।
इन नीतियों ने अभिव्यक्ति की अधिक स्वतंत्रता और अर्थव्यवस्था पर कम सरकारी नियंत्रण का नेतृत्व किया जिससे, सोवियत संघ और पश्चिम के बीच तनाव कम करने में मदद मिली।
इसके अलावा, गोर्बाचेव के निरस्त्रीकरण के आह्वान और पश्चिमी नेताओं के साथ काम करने की उनकी इच्छा ने एक अधिक शांतिपूर्ण दुनिया की उम्मीद जगाई।
परिणामस्वरूप, उन्होंने 'मध्यम दूरी परमाणु शक्ति संधि' (Intermediate-Range Nuclear Forces Treaty) जैसी हथियार संधियों पर बातचीत की जिससे, 'यूएसएसआर' (USSR) और अमेरिका के बीच तनाव को कम करने में मदद मिली।
सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था
गोर्बाचेव, ऐसे समय में सत्ता में आए जब सोवियत संघ आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रहा था।
अतः स्थिर अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए, गोर्बाचेव ने कई सुधारों को लागू किया जिन्हें पेरेस्त्रोइका (पुनर्गठन) के रूप में जाना जाता है। इन सुधारों में विकेंद्रीकरण योजना, विदेशी निवेश में वृद्धि और आलोचना के लिए अधिक खुलापन शामिल था।
इन सुधारों में राज्य के स्वामित्व वाले व्यवसायों का निजीकरण और आर्थिक निर्णय लेने का विकेंद्रीकरण करना शामिल था।
इतिहास में पहली बार, वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें आपूर्ति और मांग के आधार पर निर्धारित की गईं। पहले, यह सरकार थी, जिसने कीमतें तय की थीं।
यह व्यापक मुद्रास्फीति और आर्थिक झटके की ओर लेकर गया जिससे, कई सोवियत नागरिकों को कठिनाई हुई, जो आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं के लिए सब्सिडी प्राप्त करने के आदी थे।
इसके अलावा, गोर्बाचेव के सुधारों ने विदेशी कंपनियों से प्रतिस्पर्धा में वृद्धि की जिसने, सोवियत उद्योग पर दबाव डाला। इन कारकों के संयोजन से गोर्बाचेव की नीतियों के प्रति व्यापक असंतोष पैदा हुआ।
सोवियत सरकार के साथ पेरेस्त्रोइका (पुनर्गठन) ने महत्वपूर्ण असंतोष उत्पन्न किया और लोगों को अपनी राय व्यक्त करने की अधिक स्वतंत्रता देकर पूर्वी यूरोप में साम्यवाद के पतन में योगदान दिया।
उनकी विरासत अभी भी रूस और अन्य पूर्व सोवियत गणराज्यों में विवादास्पद है।
यद्यपि, गोर्बाचेव सीधे तौर पर सोवियत संघ के टूटने का कारण नहीं बने किन्तु, उनके सुधारों ने निस्संदेह, इसके अपकर्ष में एक भूमिका निभाई।
बहुत से लोग मानते हैं कि, उनकी नीतियों के कारण सोवियत संघ का विघटन हुआ और बाद में वह रूस को आर्थिक पतन की ओर ले गया।
साम्यवाद
सोवियत संघ के नेता के रूप में, उन्होंने, पूर्वी यूरोप में साम्यवाद के विघटन का संचालन किया। हालाँकि, कई लोग गोर्बाचेव को साम्यवाद के विश्वासघाती के रूप में देखते है।
विशेष रूप से, मिखाइल गोर्बाचेव के पूर्वी यूरोप में स्वतंत्र चुनाव की अनुमति देने के फैसले ने लोकतंत्र समर्थक विद्रोहों की एक श्रृंखला को जन्म दिया। जिसने, अंत में पूरे क्षेत्र में साम्यवादी शासन को गिरा दिया।
हालांकि, मिखाइल गोर्बाचेव की नीतियों ने साम्यवाद के पतन में एक भूमिका निभाई किंतु, यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि, सोवियत संघ के टूटने के लिए वह पूरी तरह जिम्मेदार नहीं थे।
दर्जनों जातीय समूहों और प्रतिस्पर्धी हितों के साथ सोवियत संघ विशाल था। जब गोर्बाचेव ने सत्ता संभाली तो, आंतरिक समस्याएं और बाहरी दबाव पहले ही उसे घेर चुके थे। तब भी, गोर्बाचेव के सुधारों ने इसके पतन में तेजी लाने का काम किया।
जर्मनी का एकीकरण
इस बात को नकारा नहीं जा सकता है कि, गोर्बाचेव ने 1989 की घटनाओं में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
इससे राष्ट्रवाद का उदय हुआ और इसलिए जर्मनी का एकीकरण हुआ। हालांकि, कई लोगों का तर्क है कि, पूर्वी यूरोप में लोकतंत्र और मुक्त बाजारों की जड़ें जमाने के लिए उनके सुधार आवश्यक थे।
“
सोवियत संघ के अंतिम नेता मिखाइल गोर्बाचेव को अक्सर शीत युद्ध को समाप्त करने में मदद करने का श्रेय दिया जाता है
उनके नेतृत्व में, सोवियत संघ ने पूर्वी यूरोप पर अपनी पकड़ कम करना शुरू कर दिया और जर्मनी को फिर से एकजुट होने दिया।
पूर्वी जर्मनी में स्वतंत्र चुनाव की अनुमति देने के उनके फैसले ने पूर्व और पश्चिम जर्मनी के अंतिम पुनरेकीकरण का मार्ग प्रशस्त किया।
इस खुलेपन के कारण पूर्वी जर्मनी में कई विरोध प्रदर्शन हुए जिसके, कारण अंततः बर्लिन की दीवार( Berlin Wall) गिर गई।
पश्चिम जर्मन चांसलर 'कोल' के साथ बातचीत करने की उनकी इच्छा ने भी दोनों नेताओं के बीच विश्वास और सहयोग के माहौल में योगदान दिया।
हालांकि, कुछ इतिहासकारों ने तर्क दिया है कि, गोर्बाचेव पश्चिम जर्मनी की एकीकरण की इच्छाओं को समायोजित करने में बहुत आगे निकल गए।
वे इस तथ्य की ओर इशारा करते हैं कि, उन्होंने नाटो (NATO) सदस्यता और आर्थिक सहायता जैसे निर्णायक मुद्दों पर महत्वपूर्ण रियायतें दीं। परिणामस्वरूप, वे तर्क देते है कि, गोर्बाचेव ने वास्तव में, बदले में बहुत कम के लिए बहुत ज्यादा दिया।
साथ ही, उनके पुनरेकीकरण प्रक्रिया का संचालन अत्यधिक विवादास्पद था और कई यूरोपीय लोगों ने महसूस किया कि, उन्होंने उनके भरोसे के साथ विश्वासघात किया है।
विशेष रूप से, पूर्वी जर्मन शरणार्थियों को अन्य पूर्वी यूरोपीय नेताओं के परामर्श के बिना पश्चिम जर्मनी में प्रवेश करने की अनुमति देने के गोर्बाचेव के फैसले ने, सोवियत संघ और उसके सहयोगियों के बीच एक महत्वपूर्ण दरार पैदा कर दी।
प्रसिद्ध, फिर भी, विवादास्पद
एक ओर, उनके सुधारों ने पूर्वी यूरोप में अधिक स्वतंत्रता और लोकतंत्र का नेतृत्व किया। तो दूसरी ओर, उनकी नीतियों ने आर्थिक उथल-पुथल और राजनीतिक अस्थिरता भी पैदा की।
किसी के स्पष्टीकरण के बावजूद, इसमें कोई संदेह नहीं है कि, मिखाइल गोर्बाचेव यूरोपीय इतिहास में एक बहुत ही महत्वपूर्ण व्यक्ति थे जिन्होंने, सोवियत संघ और पूरे यूरोप पर परिवर्तनकारी प्रभाव डाला था।
अंत में, यह कह सकते है कि,मिखाइल गोर्बाचेव की विरासत पेचीदा और ध्यान आकर्षित करने वाली है। जो उन्हें, हमारे समय के सबसे दिलचस्प नेताओं में से एक बनाती है।
To Comment: connect@expertx.org
Support Us - It's advertisement free journalism, unbiased, providing high quality researched contents.