शिक्षा को सशक्त बनाना: जेनरेटिव एआई टूल्स की क्षमता
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शिक्षा को सशक्त बनाना: जेनरेटिव एआई टूल्स की क्षमता
Empowering Education: Potential of Generative AI Tools का हिन्दी रूपांतर एवं सम्पादन
~ सोनू बिष्ट
यह शिक्षा प्रणाली में *आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) (एआई) के बारे में एक भविष्यवादी विषय है।
इस बात पर बहस बढ़ रही है कि क्या स्कूलों को सीखने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और अन्य जेनरेटिव टूल्स (उपकरण) के उपयोग पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाना चाहिए या इसके बजाय छात्रों द्वारा इनके व्यापक उपयोग के विकल्प को चुनना चाहिए।
चैटजीपीटी (ChatGPT) और बार्ड (Bard) जैसे टूल्स का, इतने कम समय में तेजी से विस्तार होने से हम यह तो समझ ही गए हैं कि ये लोगों की अपेक्षा से कहीं ज्यादा तेजी से नई चुनौतियां पेश कर रहे हैं।
यह समाज, कुल मिलाकर जेनेरेटिव एआई प्रौद्योगिकियों की इस क्षमता को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हो सकता।
दूसरी ओर, विशेषज्ञों को यकीन है कि इस नई तकनीक में ऐसे अवसर हैं, जो युवा दिमागों को उनके विषयों को और अच्छे ढंग से समझने और छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए प्रेरित करने में उनका मार्गदर्शन कर सकते हैं।
हमारे विचार में, ये उत्पादक प्रौद्योगिकियाँ शिक्षा के संबंध में समाज में समानता और बराबरी लाती हैं। ये प्रौद्योगिकियाँ अब शिक्षा प्रणाली में जुड़ी हुई हैं और वस्तुतः मुफ़्त (virtually free) हैं।
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टूल्स के अत्यधिक उपयोग के कारण प्राकृतिक क्षमताओं के खोने का खतरा हमेशा से ही बना हुआ है
18 वीं सदी की स्थिति की कल्पना करें , जहां केवल अमीर और शक्तिशाली लोगों के घरों में ही किताबों की लाइब्रेरी होती थी।
अब, यह कम विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के लिए कोई शर्त नहीं है। इसने समाज मे समानता का निर्माण किया है और नई सोच और सभी के लिए शिक्षा की संभावना के द्वार खोले हैं।
समाज में इंटरनेट तक पहुंच रखने वाला कोई भी व्यक्ति ज्ञान तक पहुंच सकता है, और यह पूरे देश की आबादी के लिए उपलब्ध होगा।
उदाहरण के लिए, सुदूर अफ्रीकी गांवों और बढ़िया ब्रिटिश स्कूलों के बच्चों को समान रूप से ज्ञान संसाधनों तक पहुंच प्राप्त होगी।
इसलिए, यह "कोई भी बच्चा पीछे न छूटे" (No Child Be Left Behind), आदर्श वाक्य (Motto) का प्रबल समर्थक होगा।
वर्तमान में, जेनरेटिव एआई ने, शैक्षणिक उपयुक्तता और शिक्षा प्रणाली की वर्तमान स्थिति में जो हानिकारक प्रभाव यह ला सकता है, उसके बारे में प्रासंगिक प्रश्न उठाए हैं।
समय बदलता है, और उसी तरह से चीजों को करने के तरीके और उपकरण भी बदलते हैं।
इसलिए, बेशक, विशेषज्ञों और शासी निकायों (Governing bodies) को सुरक्षा, बचाव और दुरुपयोग की रोकथाम का ख्याल रखना चाहिए।
देश को सामान्य तौर पर, और शैक्षणिक संस्थानों को एक मजबूत और सुरक्षित साइबरस्पेस प्रशासन (Cyberspace administration) की आवश्यकता है।
इसलिए, आयु समूह के संपर्क में आने के अनुरूप कुछ सूचनात्मक नियंत्रण उस जगह पर होने चाहिए।
तो सवाल यह नहीं है कि शिक्षा में, जेनरेटिव एआई की अनुमति दी जानी चाहिए या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि, समाज के आधुनिकीकरण के हिस्से के रूप में, इसका कितने सुरक्षित और प्रभावी ढंग से उपयोग किया जाना चाहिए।
निश्चित रूप से, किसी भी अन्य प्रचलित तकनीक की तरह ही इस तकनीक का भी दुरुपयोग होगा और इनकी एक अच्छी जांच तभी हो पाएगी जब इनके टूल्स का उपयोग इन छात्रों की सामान्य क्षमताओं को बढ़ाने के लिए जारी रहेगा।
हमें यह तर्क मिलता है कि टूल्स के अत्यधिक उपयोग से छात्र की मानसिक क्षमताएँ बाधित हो जाती हैं।
जब कैलकुलेटर का आविष्कार हुआ, तो यही समान तर्क सामने रखा गया था कि, इससे मानसिक अंकगणित करने की प्राकृतिक क्षमता में ज़बर्दस्त रूप से कमी आएगी।
आज हम इस तर्क को सच पाते हैं क्योंकि, बुनियादी गणनाओं के लिए भी लोग मानसिक गणित के बजाय कैलकुलेटर का उपयोग कर रहे हैं।
टूल्स के अत्यधिक उपयोग के कारण प्राकृतिक क्षमताओं के खोने का खतरा हमेशा से ही बना हुआ है। दूसरी ओर, समाज की उत्पादकता के लिए (उत्पादक समाज) टूल्स आवश्यक हैं।
यहाँ पर चुनौती है, मानसिक क्षमताओं को संतुलित करना और व्यक्ति और समाज के सकारात्मक विकास के लिए जेनरेटिव एआई टूल्स का प्रभावी ढंग से उपयोग करना।
शिक्षा में जेनरेटिव एआई का उपयोग सिर्फ ज्ञान की उपलब्धता या ज्ञान प्रदान करने तक सीमित नहीं हो सकता है।
यह विद्यार्थियों के मानकों, उनकी प्रगति, उनके प्रतिभा प्रबंधन (Talent management) और सामान्य मूल्यांकन (General assessment) को भी प्रभावी ढंग से प्रबंधित कर सकता है।
सच तो यह है कि, यह शिक्षकों और प्रशिक्षकों को छात्रों की विशेष प्रकृति और जरूरतों को बेहतर ढंग से समझने की अनुमति देगा।
मगर, यहाँ पर सावधानी भी बरतनी होगी; एक व्यक्ति के बारे में इतना गहन ज्ञान और वो भी जीवन के शुरुआत में, किसी व्यक्ति की गोपनीयता, उसकी निजी जानकारी, पूर्वधारणा और ऐसी प्रोफाइलिंग (profiling) से आगे जिंदगी में रुकावट पैदा कर सकती है।
जेनरेटिव एआई का उपयोग करके, बहुत ज्यादा कारकों के आधार पर किसी छात्र की क्षमता को ट्रैक करना एक व्यक्ति के लिए नौकरी बाजार में जोखिम भरा हो सकता है और उसके बाद उनके कॅरियर में भी।
वर्तमान में, नौकरी बाजार में प्रचलित प्रथा के अनुसार नियोक्ताओं को शैक्षणिक रिकॉर्ड, अनुभव और उपलब्धियों का ट्रैक रिकॉर्ड देखने की आवश्यकता होती है।
उन्हें किसी उम्मीदवार को काम पर रखने से पहले उसकी ताकत और कमजोरियों को जानने की भी आवश्यकता होती है। आज, यह भर्ती प्रक्रिया के प्रबंधन का एक बहुत ही साधारण तरीका है।
यह ध्यान में रखते हुए कि किसी उम्मीदवार के बचपन से ही उसके बारे में व्यापक जानकारी उपलब्ध है, इसलिए नियोक्ता को एआई-जनरेटेड एनालिटिक्स के आधार पर एक व्यक्ति पर कोई पूर्वाग्रह हो सकता है।
इस कारण से, बदलते हुए समाज के साथ, नौकरी बाजार भी बदल जाएगा। इसलिए, छात्रों को नौकरी बाजार में गतिशील परिवर्तनों के अनुसार अपनी क्षमताओं को भी उसी के अनुरूप ढालना चाहिए।
जेनरेटिव एआई को समाज में सामान्य प्रयोजन उपलब्धता से प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता है।
यह किसी व्यक्ति के अस्तित्व में रहने के लिए पर्याप्त और आवश्यक शर्त होगी और 21 वीं सदी के इंटरनेट की तरह ही आवश्यक होगी। इसलिए, यह जरूरी हो जाता है कि इस संसाधन का इसकी सर्वोत्तम क्षमताओं तक उपयोग किया जाए।
सामान्य रूप में, छात्रों और समाज को जिस एकमात्र अंतर का सामना करना पड़ेगा वह है परिवर्तन की दर ।
इससे पहले पिछली शताब्दियों में, में हमने देखा कि नौकरी बाजार में बदलाव होना दशकों का मामला है। जेनेरिक एआई के आगमन के साथ, यह परिवर्तन कुछ महीनों या अधिकतम एक वर्ष में दिखाई देगा।
बेशक, यह एक चुनौती है, लेकिन अनिवार्य भी है।
इसलिए, यह जरूरी है कि शैक्षणिक संस्थान इन परिवर्तनों के अनुकूल बनने के तरीकों को अपनी शिक्षा प्रणाली में शामिल करें, ताकि वे अपने छात्रों और युवा पीढ़ी को कल के लिए तैयार कर सके।
*आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस क्या है?
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की शुरुआत 1950 के दशक में हुई थी। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का अर्थ है बनावटी (कृत्रिम) तरीके से विकसित की गई बौद्धिक क्षमता।
इसके ज़रिये कंप्यूटर सिस्टम या रोबोटिक सिस्टम तैयार किया जाता है, जिसे उन्हीं तर्कों के आधार पर चलाने का प्रयास किया जाता है जिसके आधार पर मानव मस्तिष्क काम करता है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जनक जॉन मैकार्थी के अनुसार यह बुद्धिमान मशीनों, विशेष रूप से बुद्धिमान कंप्यूटर प्रोग्राम को बनाने का विज्ञान और अभियांत्रिकी है अर्थात यह मशीनों द्वारा प्रदर्शित किया गया इंटेलिजेंस है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कंप्यूटर द्वारा नियंत्रित रोबोट या फिर मनुष्य की तरह इंटेलिजेंस तरीके से सोचने वाला सॉफ़्टवेयर बनाने का एक तरीका है।
यह इसके बारे में अध्ययन करता है कि मानव मस्तिष्क कैसे सोचता है और समस्या को हल करते समय कैसे सीखता है, कैसे निर्णय लेता है और कैसे काम करता है।
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