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भारत की सबसे गंभीर आर्थिक समस्या यह है कि शिक्षा (Education), कौशल (Skills), निवेश (Investment) और वास्तविक रोज़गार (Actual Employment) के बीच का अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है।
भारत का रोज़गार संकट आंकड़ों से कहीं अधिक गहरा है:
देश में बेरोज़गारी की समस्या केवल सरकारी आंकड़ों तक सीमित नहीं है। बड़ी संख्या में युवा न केवल बेरोज़गार हैं, बल्कि वे पढ़ाई, प्रशिक्षण (Training) और नौकरी की तलाश करने की प्रक्रिया से पूरी तरह बाहर हो चुके हैं। यह स्थिति आधिकारिक आंकड़ों से कहीं ज़्यादा गंभीर है।
केवल कौशल (Skilling) सिखा देना काफी नहीं है:
बड़े पैमाने पर चलाए जा रहे प्रशिक्षण कार्यक्रमों ने लाखों प्रमाण पत्र (Certificates) तो बाँट दिए हैं, लेकिन लेख का तर्क है कि सफलता का पैमाना यह होना चाहिए कि कितने लोगों को असल में नौकरी मिली, उनका
वेतन क्या है, वे नौकरी में टिके रहे या नहीं और उनकी उत्पादकता (Productivity) कितनी है—न कि केवल प्रशिक्षित किए गए लोगों की संख्या।
शिक्षा सुरक्षित काम की गारंटी नहीं दे पा रही:
डिग्री हासिल करने वाले लाखों युवा अपनी योग्यता के अनुसार सही नौकरी पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इस वजह से वे मजबूरन सरकारी नौकरियों की प्रतियोगी परीक्षाओं (Competitive Exams) की लंबी कतारों में लगने को विवश हैं।
भारत को उत्पादक कार्य पर आधारित एक मजबूत रोज़गार रणनीति की ज़रूरत है:
स्टार्ट-अप्स (Start-ups), नए नारे और चुनिंदा सफलता की कहानियाँ व्यापक स्तर पर नए रोज़गार पैदा नहीं कर सकतीं।
विशेषकर विनिर्माण क्षेत्र (Manufacturing Sector) में, जहाँ भारत अब तक वह रोज़गार का पुल (Employment Bridge) तैयार नहीं कर पाया है जिसकी यहाँ के युवाओं को सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।
अगस्त 2026
भारत की सबसे गंभीर आर्थिक समस्या केवल बेरोज़गारी नहीं है। असली समस्या शिक्षा, कौशल, निवेश और वास्तविक रोज़गार के बीच लगातार बढ़ती दूरी है।
आज एक युवा डिग्री हासिल कर सकता है, कौशल प्रमाण पत्र (Skill Certificate) ले सकता है, सरकारी परीक्षाओं के लिए आवेदन कर सकता है और स्टार्ट-अप (उद्यमिता) की कोशिश भी कर सकता है—इसके
बावजूद वह पाता है कि अर्थव्यवस्था में उसके लिए कोई पर्याप्त उत्पादक (Productive) नौकरी उपलब्ध नहीं है।
वर्ष 2026 में भारत के रोज़गार की कहानी का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है।
नीति आयोग की ताज़ा रिपोर्ट (Reimagining Skilling for Viksit Bharat@2047) इस समस्या की गंभीरता को साफ़ दिखाती है:
NEET श्रेणी (9 करोड़ युवा): लगभग 9 करोड़ ऐसे युवा (15 से 29 वर्ष) हैं जो "न तो शिक्षा में हैं, न रोज़गार में और न ही किसी प्रशिक्षण में" (NEET - Not in Education, Employment or Training)।
इसमें नौकरी की सक्रिय तलाश करने वालों को शामिल नहीं किया गया है।
सक्रिय बेरोज़गार (2 करोड़ युवा): लगभग 2 करोड़ ऐसे लोग हैं जो श्रम बल (Labour Force) का हिस्सा हैं और सक्रिय रूप से नौकरी तलाश रहे हैं, लेकिन उन्हें काम नहीं मिल रहा।
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जुलाई 2026 के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 15 वर्ष और उससे अधिक आयु की कुल आबादी में बेरोज़गारी दर 5.1% है, जबकि श्रम बल में शामिल युवाओं में बेरोज़गारी दर 15.6% है
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पहला समूह (NEET) उन युवाओं का है जो शिक्षा, प्रशिक्षण और रोज़गार की पूरी प्रक्रिया से निराश होकर बाहर हो चुके हैं। जबकि दूसरा समूह उन लोगों का है जो अभी भी काम की तलाश में हैं।
यह स्थिति सामान्य बेरोज़गारी दर से कहीं ज़्यादा चिंताजनक है। जो व्यक्ति निराश होकर नौकरी ढूंढना ही छोड़ देता है, उसे सामान्य बेरोज़गारी के आंकड़ों में नहीं गिना जाता।
इसलिए, यह आंकड़ों की समस्या समाज की एक बड़ी समस्या बन जाती है: निराशा बेरोज़गारी के आंकड़ों से तो गायब हो सकती है, लेकिन समाज से नहीं।
जुलाई 2026 के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 15 वर्ष और उससे अधिक आयु की कुल आबादी में बेरोज़गारी दर 5.1% है, जबकि श्रम बल में शामिल युवाओं में बेरोज़गारी दर 15.6% है।
इसलिए मुख्य आंकड़े पूरी कहानी नहीं बताते। असली और गहरा सवाल यह है: "जब कोई देश लाखों युवाओं को प्रशिक्षित (Train) तो कर देता है, लेकिन उनके लिए पर्याप्त उत्पादक काम तैयार नहीं कर पाता, तब क्या होता है?"
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1. केवल एक और ट्रेनिंग प्रोग्राम समाधान नहीं है
इसका जवाब केवल एक और नया प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू कर देना नहीं हो सकता। 'स्किल इंडिया' (Skill India) मिशन को 2015 में बहुत बड़े और महत्वाकांक्षी लक्ष्य के साथ शुरू किया गया था।
लेकिन पिछले एक दशक की बहस अब लोगों को सिर्फ ट्रेनिंग देने से हटकर इस सवाल पर आ गई है कि "क्या इस ट्रेनिंग से सचमुच नौकरी मिल भी रही है या नहीं?"
आँकड़ों के अनुसार:
2014 से अब तक सरकार के विभिन्न कौशल विकास कार्यक्रमों के ज़रिए 7.66 करोड़ से अधिक लोगों को प्रशिक्षित किया जा चुका है।
अकेले 'प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना' (PMKVY) के तहत 1.64 करोड़ से अधिक लोगों को ट्रेनिंग दी गई।
(स्किल इंडिया का शुरुआती लक्ष्य 2022 तक 40 करोड़ लोगों को प्रशिक्षित करना था।)
खुद सरकार की सोच में भी अब बदलाव आया है। नीति आयोग की 2026 की रिपोर्ट मानती है कि कौशल विकास को एक अलग-थलग योजना के रूप में नहीं देखा जा सकता।
रिपोर्ट में उद्योगों से जुड़ी शिक्षा, अप्रेंटिसशिप (Apprenticeship), नतीजों पर आधारित कार्यक्रम, बेहतर करियर मार्गदर्शन और "सीखने और कमाने" (Learning and Earning) के बीच एक लगातार संपर्क बनाए रखने की बात कही गई है। यह एक बहुत बड़ा स्वीकारनामा है।
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'समर्थ' योजना के तहत लगभग 6,17,000 लोगों को ट्रेनिंग दी गई, जिनमें से लगभग 5,17,000 लोगों को ही रोज़गार मिला
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2. कपड़ा (Textile) उद्योग का उदाहरण
कपड़ा उद्योग इस समस्या को बहुत साफ़ तरीके से दिखाता है। 'समर्थ' (Samarth) योजना के तहत कपड़ा मंत्रालय 2017 से उद्योग की मांग पर आधारित और रोज़गार-उन्मुख ट्रेनिंग चला रहा है।
संसद में दिए गए आंकड़ों के अनुसार इसमें सैकड़ों करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं।
11 अगस्त 2026 तक के आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं:
'समर्थ' योजना के तहत लगभग 6,17,000 लोगों को ट्रेनिंग दी गई, जिनमें से लगभग 5,17,000 लोगों को ही रोज़गार मिला।
इसका मतलब है कि 1,00,000 से अधिक प्रशिक्षित युवा बिना किसी नौकरी के रह गए।
ट्रेनिंग लेने वालों में लगभग 88% महिलाएँ हैं।
इस योजना के अगले चरण (Samarth 2.0) के लिए 5 वर्षों में ₹2,800 करोड़ का बजट प्रस्तावित है, जिसका लक्ष्य 15 लाख लोगों को उद्योगों के लायक बनाना है।
सवाल यह नहीं है कि ट्रेनिंग उपयोगी है या नहीं (वह निश्चित रूप से उपयोगी है)। सवाल यह है कि "क्या सरकार उन चीज़ों को माप रही है जो सचमुच मायने रखती हैं?—जैसे नौकरी, वेतन, नौकरी में टिके रहना और कार्य क्षमता।
" यदि कोई व्यक्ति ट्रेनिंग के बाद भी बेरोज़गार रहता है, तो योजना ने मानव पूंजी (Human Capital) नहीं, बल्कि सिर्फ एक कागज़ी प्रमाण पत्र पैदा किया है।
3. उच्च शिक्षा की स्थिति
यही विरोधाभास शिक्षा के उच्च स्तर पर भी दिखाई देता है। आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के आंकड़ों के अनुसार केवल 8.25% स्नातकों (Graduates) को ही अपनी योग्यता के अनुरूप नौकरी मिल पाती है।
देश में लगभग 3.4 करोड़ युवा ग्रेजुएशन में दाखिला लेते हैं, जिनमें से लगभग 1.3 करोड़ युवा बी.ए. (BA) की पढ़ाई कर रहे होते हैं।
यह भारतीय अर्थव्यवस्था में एक अजीब स्थिति पैदा करता है, जहाँ शिक्षा केवल बेरोज़गारी को छुपाने या टालने का एक जरिया (Holding Area) बनकर रह गई है।
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जब निजी क्षेत्र में पर्याप्त रोज़गार नहीं मिलते, तो युवा सरकारी परीक्षाओं की ओर रुख करते हैं। NEET, JEE, UPSC, रेलवे भर्ती और अन्य प्रतियोगी परीक्षाएँ केवल परीक्षाएँ नहीं रह जातीं, बल्कि यह अवसर पाने की एक राष्ट्रीय लॉटरी बन जाती हैं।
यह केवल शिक्षा का संकट नहीं है, बल्कि देश के आर्थिक ढांचे का संकट (Economic-structure crisis) है।
आंकड़ों के अनुसार, पाँच बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में देश के परिवारों पर फीस, कोचिंग, रहने के खर्च, यात्रा और अन्य व्यवस्थाओं के रूप में लगभग ₹3.5 लाख करोड़ का भारी-भरकम वित्तीय बोझ पड़ता है।
भले ही इस आंकड़े के हर हिस्से का अलग से स्वतंत्र मूल्यांकन किया जा सकता है, लेकिन इसके पीछे की हकीकत बिल्कुल स्पष्ट है: लाखों शिक्षित युवा बहुत ही कम और सीमित सुरक्षित सरकारी नौकरियों के लिए आपस में होड़ कर रहे हैं।
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केंद्र सरकार में खाली पड़े पदों (Vacancies) की संख्या 2015 के 4.21 लाख से बढ़कर 2024 में 8.24 लाख हो गई
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सरकार स्वयं एक बहुत बड़ी नियोक्ता (Employer) होने के साथ-साथ युवाओं के लिए निराशा का एक बड़ा कारण भी है।
'दैनिक भास्कर' के आंकड़ों के अनुसार:
केंद्र सरकार में खाली पड़े पदों (Vacancies) की संख्या 2015 के 4.21 लाख से बढ़कर 2024 में 8.24 लाख हो गई।
कुल स्वीकृत पदों में से खाली पदों की हिस्सेदारी 11.5% से बढ़कर 21% हो गई।
अकेले रेलवे में लगभग 2.40 लाख पद खाली पड़े हैं, जो कुल स्वीकृत पदों का 16% से अधिक है।
इसके साथ ही, सरकारी कंपनियों में कॉन्ट्रैक्ट (अनुबंध) पर काम करने वाले कर्मचारियों का अनुपात 2015 के 18.6% से बढ़कर 2025 में 49.1% हो गया।
विरोधाभास बिल्कुल साफ़ है: एक तरफ सरकार युवाओं की 'रोज़गार-क्षमता' (Employability) बढ़ाने की बात करती है, तो दूसरी तरफ अपने ही स्वीकृत पदों को खाली रखती है और ठेके (कॉन्ट्रैक्ट) पर काम कराने की नीति बढ़ा रही है।
भारत आज अपने विशाल स्टार्ट-अप इकोसिस्टम का जश्न मनाता है। सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त 2,12,000 से अधिक स्टार्ट-अप्स हैं, लेकिन संसद में दिए गए जवाब के अनुसार इनमें से 6,789 मान्यता प्राप्त स्टार्ट-अप्स बंद भी हो चुके हैं।
इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि कितने स्टार्ट-अप्स शुरू हुए।
"प्रचार या दिखावा (Optics) कोई आर्थिक सूचकांक नहीं होता।"
असली सवाल यह हैं:
इन स्टार्ट-अप्स ने कितने लोगों को रोज़गार दिया ?
वे कितना वेतन देते हैं ?
5 साल बाद उनमें से कितने बच पाते हैं ?
वे कितनी निजी पूंजी आकर्षित कर पाते हैं और कितनी कंपनियाँ वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनती हैं ?
यही सवाल भारत की बहुत विज्ञापित 'स्पेस इकोनॉमी' (अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था) से भी पूछा जाना चाहिए।
20 स्पेस स्टार्ट-अप्स के साथ प्रधानमंत्री की बैठक नीतिगत समर्थन का संकेत देने के लिए अच्छी हो सकती है, लेकिन 20 सफलता की कहानियाँ पूरे तंत्र का विकल्प नहीं बन सकतीं।
भारत की रोज़गार चुनौती आखिरकार विनिर्माण (कारखानों और निर्माण क्षेत्र) पर आकर ही टिकती है।
आंकड़ों के अनुसार, भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में विनिर्माण क्षेत्र का हिस्सा लगभग 15% है, जो 2014 के बाद से लगभग एक ही जगह पर अटका हुआ है।
माप का तरीका चाहे जो भी हो, मूल समस्या यही बनी हुई है: भारत अपने युवाओं की आबादी की ज़रूरतों के हिसाब से विनिर्माण क्षेत्र में बड़े पैमाने पर रोज़गार पैदा नहीं कर पाया है।
इसी मोड़ पर इतिहास के उदाहरणों से सीखना हमारे लिए बहुत उपयोगी हो जाता है।
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ब्रिटेन हमें पहली चेतावनी देता है। 1966 में ब्रिटेन के विनिर्माण क्षेत्र में लगभग 90 लाख (9 million) लोग काम करते थे, जो कुल कार्यबल (Workforce) का एक चौथाई से अधिक था।
लेकिन कुछ दशकों बाद, इसमें काम करने वाले लोगों की संख्या घटकर 30 लाख से भी कम (कुल कार्यबल का लगभग 8%) रह गई।
ब्रिटिश संसद की शोध सेवा ने इसे "विशेष रूप से नाटकीय विसंद्योगीकरण (Deindustrialisation)" बताया है, जो वैश्वीकरण, तकनीकी बदलाव और कारखानों के विदेशों में स्थानांतरित होने के कारण हुआ। इसके परिणाम केवल आर्थिक नहीं थे:
पुराने औद्योगिक क्षेत्रों में रोज़गार घटा, निवेश कम हुआ और सामाजिक ताना-बाना बिगड़ा।
पारंपरिक औद्योगिक समुदायों के पतन ने ब्रिटेन की राजनीति को बदल दिया, जिसने आगे चलकर वैश्वीकरण और राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ जन-असंतोष को जन्म दिया।
अमेरिका और भी अधिक सीख देने वाला उदाहरण पेश करता है:
ब्रूकिंग्स (Brookings) के अनुसार, 1980 के बाद से वैश्वीकरण, ऑटोमेशन (मशीनीकरण) और ऑफशोरिंग (काम विदेशों में भेजना) के कारण विनिर्माण क्षेत्र की लगभग 70 लाख (7 million) नौकरियाँ खत्म हो गईं।
वर्ष 2000 से 2010 के बीच, अमेरिका के ग्रेट लेक्स (Great Lakes) राज्यों में विनिर्माण क्षेत्र के रोज़गार में 35% की गिरावट आई, जिससे लगभग 16 लाख नौकरियाँ नष्ट हो गईं।
इसके सामाजिक और राजनीतिक परिणाम बहुत गहरे रहे:
कारखाने बंद हो गए, युवाओं ने पलायन किया, वेतन कम हो गया और स्वास्थ्य व पेंशन की सुविधाएँ कमज़ोर पड़ गईं।
आर्थिक तबाही राजनीतिक गुस्से में बदल गई। ब्रूकिंग्स ने 'रस्ट बेल्ट' (Rust Belt - अमेरिका के पुराने औद्योगिक क्षेत्र) के पतन को वैश्वीकरण के खिलाफ जनाक्रोश से जोड़ा, जिसने 2016 में डोनल्ड ट्रम्प की जीत की राजनीतिक परिस्थितियाँ तैयार कीं।
फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, इटली, जापान और अमेरिका के 1,993 शहरों पर किए गए शोध से एक व्यापक निष्कर्ष निकलता है:
जिन शहरों की निर्भरता विनिर्माण पर जितनी ज़्यादा थी, विऔद्योगीकरण (deindustrialisation) के समय उन्हें उतना ही बड़ा आर्थिक और रोज़गार का झटका झेलना पड़ा।
इतिहास का सबक यह नहीं है कि विनिर्माण (Manufacturing) क्षेत्र को हमेशा के लिए बचाकर रखा जाए।
असल सबक यह है कि जब उत्पादक रोज़गार नए रोज़गार बनने की गति से ज़्यादा तेज़ी से गायब होते हैं, तो उसके परिणाम अंततः सामाजिक और राजनीतिक संकट के रूप में सामने आते हैं।
इसलिए भारत को बहुत सावधान रहने की ज़रूरत है।
..... समाप्त
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