भारत-अमेरिका व्यापार समझौता: दबाव के संकेत
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भारत-अमेरिका व्यापार समझौता: दबाव के संकेत
सरसरी निगाह:
भारत-अमेरिका व्यापार समझौता: साझेदारी नहीं, दबाव का संकेत भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंधों में हुआ हालिया बदलाव साझेदारी के बजाय 'दबाव' (Coercion) का संकेत देता है।
2025 में अमेरिका द्वारा लगाए गए दंडात्मक शुल्कों (Tariffs) ने भारत के श्रम-आधारित निर्यात को भारी नुकसान पहुँचाया, और 2026 में राहत तभी मिली जब भारत ने अपने बाज़ार खोलने और बड़ी खरीद करने की प्रतिबद्धता जताई।
भारत ने कमज़ोरी की स्थिति से बातचीत की, मज़बूती से नहीं व्यापार वार्ता के दौरान ही अमेरिका में भारत के बड़े व्यापारिक घरानों (Conglomerates) की कड़ी जाँच शुरू हुई। इससे यह चिंता पैदा हुई है कि भारत से रियायतें लेने के लिए राजनैतिक और प्रतिष्ठा संबंधी दबाव का इस्तेमाल किया गया।
भारतीय कृषि को 'दबाव के मोहरे' (Collateral) के रूप में इस्तेमाल किया गया अमेरिकी कृषि उत्पादों पर 'जीरो टैरिफ' (शून्य शुल्क) की ओर बढ़ते कदम भारतीय छोटे किसानों को भारी सब्सिडी वाली अमेरिकी कंपनियों के सामने ला खड़ा करेंगे, जिनसे वे मुकाबला नहीं कर सकते।
सामाजिक कीमत चुपचाप किसानों और मज़दूरों पर डाली जा रही है खेती और श्रम-आधारित मैन्युफैक्चरिंग को इस समझौते का झटका झेलना पड़ रहा है, जबकि ये बातचीत संसद में बिना किसी खास चर्चा या सार्वजनिक खुलासे के की गई।
दीर्घकालिक जोखिम: आर्थिक संप्रभुता का कमज़ोर होना दबाव में किए गए व्यापारिक सौदे एक गलत मिसाल कायम करते हैं। इससे भारत के विशाल बाज़ार तक पहुँच दबाव के ज़रिए हासिल की जा रही है, जिसकी भारी कीमत किसानों और ग्रामीण आजीविका को चुकानी पड़ रही है।
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फ़रवरी 2026
व्यापारिक बातचीत शायद ही कभी निष्पक्ष होती है, लेकिन भारत और अमेरिका के बीच मौजूदा रिश्तों में साझेदारी के बजाय साफ तौर पर दबाव (Coercion) की छाप दिखाई देती है।
अमेरिकी आर्थिक नीति का यह तरीका जाना-पहचाना है: पहले सज़ा के तौर पर दंडात्मक शुल्क (Punitive Tariffs) लगाओ, फिर अनिश्चितता को लंबा खींचो, और अंत में राहत का प्रस्ताव दो।
लेकिन यह राहत बराबरी के आधार पर नहीं, बल्कि ऐसी शर्तों पर दी जाती है जो खेल के मैदान को स्थायी रूप से अमेरिका के पक्ष में झुका देती हैं।
2025 में, भारतीय निर्यात पर अमेरिकी शुल्क टैरिफ दंडात्मक स्तर तक पहुँच गए, कुछ मामलों में तो यह 50 प्रतिशत के करीब थे। इसका नुकसान बहुत तेज़ी से हुआ। कपड़ा (Textiles), चमड़ा, रत्न और आभूषण जैसे श्रम-आधारित क्षेत्रों में भारी गिरावट आई—कुछ श्रेणियों में तो निर्यात 40 से 60 प्रतिशत तक घट गया।
ये कोई मामूली नुकसान नहीं थे। इनका सीधा असर कारखानों के बंद होने, छंटनी और भारत के सबसे ज़्यादा रोज़गार देने वाले उद्योगों में एक्सपोर्ट ऑर्डर रद्द होने के रूप में सामने आया। इसके बाद, 2026 के समझौते को एक 'सुधार' या 'समाधान' के रूप में पेश किया गया।
भारतीय वस्तुओं पर अमेरिकी शुल्क टैरिफ घटाकर करीब 18 प्रतिशत कर दिए जाएंगे। लेकिन इस "राहत" की जो कीमत वसूली गई है, वह असाधारण है।
भारत अब सभी अमेरिकी आयातों पर से शुल्क खत्म करने की दिशा में कदम उठाएगा। इसके साथ ही, खबरें हैं कि भारत अगले पांच वर्षों में अमेरिका से की जाने वाली खरीद को बड़े पैमाने पर बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध होगा—यह आंकड़ा सालाना 42 लाख करोड़ रुपये तक हो सकता है।
वास्तव में, अमेरिका ने भारत को 0% शुल्क (Zero Tariff) पर अपना निर्यात लगभग दोगुना करने के लिए मजबूर कर दिया है। यह कोई व्यापारिक समझौता नहीं है; यह दबावपूर्वक की गई वसूली (Coercive extraction) है।
इसमें एक पक्ष (अमेरिका) तब तक दबाव बनाता है जब तक कि आर्थिक नुकसान राजनीतिक रूप से असहनीय न हो जाए। फिर दूसरा पक्ष (भारत) बाज़ार तक पहुँच (Market access) देने के लिए झुक जाता है। यह सब दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र (भारत) और सबसे शक्तिशाली अर्थव्यवस्था (अमेरिका) के बीच हो रहा है, जो इस असंतुलन को और भी ज़्यादा चिंताजनक बना देता है।
अमेरिका दशकों से भारत के घरेलू बाज़ार—विशेष रूप से कृषि, फार्मास्यूटिकल्स, डिजिटल सेवाओं और रक्षा क्षेत्र—तक पहुँच बनाने की कोशिश कर रहा था। जो काम अंतरराष्ट्रीय मंच ,जैसे विश्व व्यापार संगठन नहीं कर पाए, वह अब द्विपक्षीय दबाव के ज़रिए हासिल किया जा रहा है।
यह दबाव वाली व्यापार नीति है, जिसे 'साझेदारी' का चोला पहनाया गया है। इसलिए, यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है कि यह समझौता 'कैसे' और 'क्यों' हुआ।
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किसी भी व्यापारिक समझौते के नतीजे केवल उसकी शर्तों पर नहीं, बल्कि उस समय के हालातों पर भी निर्भर करते हैं। भारत ने 2026 की इस वार्ता में एक स्वतंत्र और मज़बूत पक्ष के रूप में प्रवेश नहीं किया, बल्कि वह स्पष्ट रूप से राजनीतिक और प्रतिष्ठा के दबाव में था।
ठीक इसी समय, भारतीय कॉर्पोरेट घरानों को अमेरिकी न्यायक्षेत्र में कड़ी जाँच का सामना करना पड़ रहा है। अडानी समूह जैसे बड़े भारतीय व्यापारिक समूहों से जुड़ी जाँच और कानूनी प्रक्रियाएँ अब अमेरिकी नियामक और राजनीतिक तंत्र का हिस्सा बन चुकी हैं।
ये कोई छोटी-मोटी समस्याएँ नहीं हैं। इनके परिणाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि को भारी नुकसान पहुँचा सकते हैं, जो सरकार गिरने का कारण भी बन सकते हैं।
किसी भी सरकार के लिए अपने सबसे बड़े कॉर्पोरेट मित्रों की रक्षा करना केवल आर्थिक प्राथमिकता नहीं, बल्कि एक राजनीतिक ज़रूरत होती है।
जब ऐसी संस्थाओं पर विदेशी कानूनी दबाव पड़ता है, तो राज्य का बातचीत करने का तरीका अनिवार्य रूप से बदल जाता है। जोखिम यह नहीं है कि नीति गैर-कानूनी हो जाती है, बल्कि यह है कि वह लाचार (Vulnerable) हो जाती है।
इस संदर्भ में, व्यापारिक रियायतें 'प्रेशर वॉल्व' (दबाव कम करने वाले रास्ते) की तरह काम करती हैं। वे आपसी रगड़ को कम करती हैं और राजनयिक संबंधों को स्थिर करती हैं। वे समय खरीदने का काम करती हैं। लेकिन वे ऐसा इसकी कीमत कहीं और स्थानांतरित करके करती हैं—आमतौर पर उन क्षेत्रों पर जिनका राजनीतिक प्रभाव कमज़ोर है।
यहीं पर आशंका गहरी हो जाती है। क्या भारत केवल आर्थिक मॉडल और दीर्घकालिक राष्ट्रीय हित के आधार पर बातचीत कर रहा था, या वह उन बाहरी दबावों को कम करने के लिए समझौता कर रहा था जो 'एपस्टीन फाइल्स' (Epstein files) जैसे खुलासों से पैदा हुए थे, जिनसे भारतीय सत्ताधारी दल के नरेंद्र मोदी जैसे शीर्ष नेताओं को खतरा था?
इस प्रक्रिया की पर्दादारी इस सवाल को अपरिहार्य बना देती है।
कोई व्यापक श्वेत पत्र (White Paper) जारी नहीं किया गया।
संसद में कोई सार्थक बहस नहीं हुई।
प्रतिबद्धताओं पर हस्ताक्षर करने से पहले किसी भी क्षेत्रवार प्रभाव का आकलन सार्वजनिक नहीं किया गया।
जब इतने बड़े स्तर के सौदे चुपचाप निपटाए जाते हैं, तो यह विश्वास नहीं, बल्कि संदेह पैदा करता है।
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यदि कोई एक ऐसा क्षेत्र है जो इस समझौते की असमानता को सबसे साफ़ तौर पर उजागर करता है, तो वह है कृषि। भारत में कृषि केवल एक आर्थिक गतिविधि नहीं है; यह आधी आबादी की आजीविका की रीढ़ है।
यह सामाजिक रूप से संवेदनशील, राजनीतिक रूप से अस्थिर और संरचनात्मक रूप से कमज़ोर क्षेत्र है। फिर भी, इसे सीधे तौर पर 'युद्ध के मैदान' में उतार दिया गया है।
साल 2025 में, भारत में अमेरिकी कृषि निर्यात लगभग 34 प्रतिशत बढ़कर लगभग 2.85 बिलियन डॉलर (करीब ₹24,000 करोड़) हो गया। वहीं, अमेरिका को होने वाला भारतीय कृषि निर्यात केवल 5 प्रतिशत बढ़ा (लगभग 5.9 बिलियन डॉलर या ₹50,000 करोड़)।
यह असंतुलन केवल मूल्य में नहीं, बल्कि क्षमता में भी है:
अमेरिकी कृषि: इसे सरकार से भारी सब्सिडी मिलती है, यह तकनीक में उन्नत है और इसके पीछे बड़े कॉर्पोरेट घरानों की ताकत है। साल 2020 में अमेरिकी सब्सिडी 46 बिलियन डॉलर (लगभग ₹4 लाख करोड़) थी।
भारतीय कृषि: यहाँ खेत छोटे और बँटे हुए हैं, और किसान सरकारी सहायता पर निर्भर हैं।
अमेरिकी कृषि आयात पर 'जीरो टैरिफ' की ओर बढ़ना कोई स्वस्थ प्रतिस्पर्धा (Competition) नहीं है। यह बिना 'बुलेटप्रूफ जैकेट' के हमले के सामने खड़े होने जैसा है। भारतीय किसान कीमत, पैमाने या सरकारी समर्थन के मामले में अमेरिकी 'एग्रीबिजनेस' का मुकाबला नहीं कर सकते।
एक बार जब सस्ता आयात घरेलू बाज़ारों में भर जाएगा, तो फसलों की सही कीमत मिलना बंद हो जाएगी। न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) को बनाए रखना राजनीतिक रूप से और कठिन हो जाएगा। किसानों की आय घटेगी और खेती छोड़ने की मजबूरी और तेज़ी से बढ़ेगी।
यह कोई केवल किताबी बात नहीं है। यह दुनिया के कई विकासशील देशों में पहले भी हो चुका है—चाहे वह नाफ्टा (NAFTA) के तहत मेक्सिको हो या अफ्रीका के कई हिस्से।
1994 के नाफ्टा समझौते ने मेक्सिको की खेती को तबाह कर दिया था, जब अमेरिका की सब्सिडी वाली सस्ती मक्का ने वहां के बाज़ार को भर दिया। नतीजा यह हुआ कि मक्का की कीमतें 66% से ज़्यादा गिर गईं और लाखों छोटे किसान बर्बाद हो गए।
इस समझौते ने, जिसने आयात शुल्क (Tariffs) खत्म कर दिए और अमेरिकी बड़े पैमाने की व्यावसायिक खेती को बढ़ावा दिया, मेक्सिको में लगभग 13 लाख से 20 लाख खेती से जुड़े रोज़गार छीन लिए।
इसने ग्रामीण गरीबी को इतना बढ़ा दिया कि लोग पलायन करने या कम वेतन वाली फैक्ट्रियों में काम करने को मजबूर हो गए। उस समझौते का नतीजा आज मेक्सिको से अमेरिका की ओर होने वाले अवैध प्रवासन (Illegal migration) के रूप में साफ़ देखा जा सकता है।
इसलिए, दबाव में थोपे गए उदार व्यापारिक समझौते 'निर्भरता' पैदा करते हैं, 'कार्यकुशलता' (Efficiency) नहीं।
हैरानी की बात यह है कि इस बड़े बदलाव पर जनता के बीच कितनी कम चर्चा हुई है। भारत की खाद्य सुरक्षा के खतरों, ग्रामीण रोज़गार को लगने वाले झटकों, या ज़मीन के उपयोग पर पड़ने वाले दीर्घकालिक प्रभावों के बारे में कोई ईमानदार राष्ट्रीय संवाद नहीं हुआ है।
ऐसा लगता है जैसे खेती को एक 'खर्च करने योग्य वस्तु' (Spendable) मान लिया गया है—एक ऐसा क्षेत्र जहाँ समझौता किया जा सकता है, क्योंकि किसानों का विरोध अलग-अलग राज्यों में बिखरा हुआ है और इसके राजनीतिक नुकसान को संभाला जा सकता है।
यदि भारत अमेरिका के साथ रणनीतिक राहत (Geopolitical breathing room) पाने के लिए अपने कृषि क्षेत्र को इतने बड़े पैमाने पर खोल रहा है, तो वह एक ऐसा जुआ खेल रहा है जिसके परिणाम धीरे-धीरे लेकिन बहुत ही घातक तरीके से सामने आएंगे।
यह एक और 'ईस्ट इंडिया कंपनी' जैसा परिदृश्य है, फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार यह अमेरिकियों द्वारा किया जा रहा है, जो अंग्रेजों के ही चचेरे भाई हैं।
दुख की बात है कि 250 वर्षों के औपनिवेशिक शासन के बाद भी, भारत सरकार ने साम्राज्यवादी इतिहास से और उसके उन विनाशकारी परिणामों से कोई सबक नहीं सीखा है, जिन्होंने कभी दुनिया की सबसे समृद्ध अर्थव्यवस्था रहे 'भारत' को बर्बाद कर दिया था।
अंतिम और सबसे असहज करने वाला सवाल इसके मकसद को लेकर है। आखिर यह सौदा किस समस्या को हल करने की कोशिश कर रहा है? कागजों पर तो यह व्यापार को आसान बनाने की बात है, लेकिन हकीकत
में यह 'एपस्टीन खुलासों' (Epstein disclosures) और विवादास्पद संबंधों के कारण उठे तूफान को शांत करने की कोशिश जैसा दिखता है।
यह अमेरिकी राजनीतिक और कानूनी व्यवस्था से आने वाले बाहरी दबाव, राजनयिक कड़वाहट और टैरिफों को कम करने का एक जरिया लगता है।
"जब व्यापार नीति ऐसे हालातों में बनाई जाती है, तो वह 'रणनीतिक' (Strategic) नहीं रह जाती। वह 'लेन-देन' (Transactional) बन जाती है।"
इसमें भविष्य की आर्थिक मजबूती के बजाय तात्कालिक राजनीतिक स्थिरता को प्राथमिकता दी जाती है। इसकी कीमत उन लोगों पर डाल दी जाती है—जैसे किसान—जिनकी पहुँच बातचीत वाले कमरों (Negotiating rooms) तक नहीं है। क्या कृषि व्यापार वार्ता में भारतीय किसानों के किसी प्रतिनिधि को शामिल किया गया था?
भारतीय कृषि इस ढांचे में पूरी तरह फिट बैठती है। यह एक विशाल और बिखरा हुआ क्षेत्र है, जिसे सौदेबाजी की ताकत के बजाय सब्सिडी के जरिए राजनीतिक रूप से मैनेज किया जाता है। इसका बलिदान देने से तुरंत कोई बड़ा राजनीतिक विद्रोह नहीं होता।
इसका नुकसान बहुत शांति से जमा होता है—गिरती कीमतों, बढ़ते कर्ज और ग्रामीण संकट के रूप में। भारतीय किसान पहले से ही भारी आर्थिक तंगी का सामना कर रहे हैं और सभी क्षेत्रों में उनकी आय सबसे कम है।
यही कारण है कि आत्महत्या की दर सबसे अधिक है, 2023 में ही वित्तीय संकट के कारण लगभग 10,786 किसानों ने अपनी जान दे दी थी।
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सबसे बड़ा जोखिम एक 'मिसाल' (Precedent) बन जाने का है। अगर अमेरिका को यह समझ आ गया कि भारत के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों तक पहुँच दबाव बनाकर हासिल की जा सकती है, तो यह उसकी आखिरी मांग नहीं होगी। फिर औपनिवेशिक काल की तरह, व्यापार आपसी लाभ का जरिया नहीं, बल्कि ताकत के खेल में 'आदेश पालन' (Compliance) का हथियार बन जाएगा।
यह अमेरिका के साथ जुड़ने के खिलाफ तर्क नहीं है। भारत को बड़ी शक्तियों के साथ गहरे आर्थिक संबंधों की ज़रूरत है। लेकिन बराबरी के बिना जुड़ाव 'आत्मसमर्पण' (Submission) है। और व्यापार सौदे के चोले में किया गया यह समर्पण सरकार की लोकतांत्रिक जवाबदेही को खत्म कर देता है।
140 करोड़ लोगों के देश को इस तरह बातचीत नहीं करनी चाहिए जैसे उसके पास कोई विकल्प ही न हो। उसे राजनयिक शांति के लिए अपनी खाद्य सुरक्षा का सौदा नहीं करना चाहिए।
उसे करोड़ों लोगों की कीमत पर कुछ शक्तिशाली हितों की रक्षा नहीं करनी चाहिए, जिन्हें अंततः इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। यदि यह समझौता बिना पारदर्शिता, बिना सुरक्षा उपायों और बिना उस दबाव की सच्चाई को स्वीकार किए आगे बढ़ता है, जिसने इसे आकार दिया है, तो भारतीय कृषि रातों-रात धराशायी नहीं होगी। इसे धीरे-धीरे भीतर से खोखला कर दिया जाएगा।
जब तक इसके परिणाम राजनीतिक रूप से साफ दिखने लगेंगे, तब तक इन्हें सुधारने का समय हाथ से निकल चुका होगा। यही दबाव वाले व्यापार (Coercive trade) की असली कीमत है।
"असली मुद्दा वे सुर्खियाँ बटोरने वाले आंकड़े नहीं हैं, बल्कि 2026 में खामोशी के जरिए भारत की आर्थिक और सामाजिक संप्रभुता (आजादी) का धीरे-धीरे खत्म होना है।"
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