भारत बनाम चीन:
क्या चीन भारत को मात दे रहा है?
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भारत बनाम चीन:
क्या चीन भारत को मात दे रहा है?
India vs. China: Is China Outmanoeuvring India? का हिन्दी रूपांतर
~ सोनू बिष्ट
16 अगस्त 2024 को प्रकाशित एक हालिया रिपोर्ट में समाचार पत्र ने भारतीय नौसेना युद्धपोत आईएनएस (INS) ‘मुंबई’ के, श्रीलंका की तीन दिवसीय यात्रा के दौरान उसके कोलंबो बंदरगाह पर पहुँचने के ऊपर अपने विचार प्रकट किए।
इस आयोजन को विचार करने योग्य बनाने वाली बात यह थी कि, इसके साथ में , तीन बड़े चीनी नौसैनिक जहाज भी, कोलंबो बंदरगाह पर पहुँचे थे।
भारतीय नौसैनिक दल में 450 नौसैनिक शामिल थे, जबकि चीनी दल में लगभग 1,500 कर्मी थे - जो भारत की उपस्थिति का लगभग साढ़े तीन गुना था।
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भारतीय नौसैनिक दल में 450 नौसैनिक शामिल थे, जबकि चीनी दल में लगभग 1,500 कर्मी थे
गुरुवार, 29 अगस्त को निर्धारित किया गया है कि श्रीलंकाई नौसेना जहाज़, चीन और भारत के साथ एक ही समय में द्विपक्षीय नौसैनिक अभ्यास करेंगे। भारतीय उपमहाद्वीप में हाल ही में हुए भू-राजनीतिक बदलावों के मद्देनज़र यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण है।
इस बात को लेकर चिंता बढ़ रही है कि चीन की आक्रामक समुद्री कूटनीति और उसके पड़ोसी देशों में बढ़ते आर्थिक एवं सैन्य प्रभाव से भारत रणनीतिक रूप से घिरा हुआ है।
चर्चा अब इस ओर मुड़ती है कि चीन ने अपनी *आर्थिक शासन कला (economic statecraft) और वित्तीय लाभ के ज़रिए भारत को किस तरह से रणनीतिक रूप से घेर रखा है।
हालाँकि चीन की *हार्ड पावर (कठोर शक्ति) अभी तक इस क्षेत्र में प्रकट नहीं हुई है, लेकिन ऐसा लगता है कि यह केवल समय की बात है जब इसकी सैन्य उपस्थिति अत्यधिक प्रभावशाली हो जाएगी।
कई भारतीय इसे स्वीकार करने के खिलाफ़ हो सकते हैं, लेकिन भारत की विदेश नीति और पड़ोस रक्षा रणनीतियां अपेक्षा से कम और बहुत ही बेअसर नज़र आ रही हैं।
पश्चिम में पाकिस्तान, पूर्व में बांग्लादेश और दक्षिण में श्रीलंका और मालदीव की जांच करने पर चिंताजनक तस्वीर सामने आती है। पाकिस्तान, जो लंबे समय से भारत का दुश्मन रहा है, उसे चीन से महत्वपूर्ण आर्थिक और सैन्य मदद मिली है।
हालांकि यह गठबंधन नया नहीं है, लेकिन पाकिस्तान की नौसेना के साथ चीन के सैन्य सहयोग का स्तर अब ऐसा हो गया है कि यह भारत के नौसैनिक नियंत्रण के लिए गंभीर चुनौती खड़ी कर सकता है।
2028-2029 तक पाकिस्तान को चीन से आठ युआन श्रेणी की डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां मिलना प्रस्तावित है।
अपने बहु-भूमिका वाले युद्ध पोत (Warship) के साथ मिलकर पाकिस्तान का नौसैनिक बेड़ा आकार और क्षमता में भारत की पश्चिमी नौसेना कमान के बराबर होगा।
पाकिस्तान और चीन के बीच बढ़ती सैन्य साझेदारी को चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) से भी बल मिल रहा है, जो चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) की एक प्रमुख परियोजना है।
यह गलियारा उत्तरी पाकिस्तान से दक्षिणी तट तक फैला हुआ है, जिससे चीन का क्षेत्रीय प्रभाव काफी बढ़ गया है।
हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की मौजूदगी लगातार बढ़ रही है, जो रणनीतिक बुनियादी ढांचे के निवेश से प्रेरित है। इसकी आर्थिक कूटनीति ने भारत को पीछे छोड़ दिया है, चीन बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों में बंदरगाह, पुल और राजमार्ग बना रहा है।
बांग्लादेश, विशेष रूप से, ढाका में भारतीय सरकार के घटते प्रभाव और भारत विरोधी भावना में वृद्धि के कारण चर्चा में रहा है।
शेख हसीना के सत्ता से हटने से भारत की स्थिति और कमजोर हो सकती है, क्योंकि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) पहले ही भारत के साथ प्रमुख द्विपक्षीय समझौतों को रद्द करने की मांग कर रही है।
इस बीच, चीन बांग्लादेश के लिए एक अपरिहार्य भागीदार के रूप में उभरा है।
दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगभग 18 अरब डॉलर तक पहुँच गया है, और चीन ने अपने चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत बड़े पैमाने पर बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं के लिए प्रतिबद्धता जताई है, जिसमें पद्मा ब्रिज, पायरा पावर प्लांट और अन्य शामिल हैं।
साथ ही, भारत की घरेलू नीतियों, जैसे कि राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) और नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) ने बांग्लादेश में भारत विरोधी भावनाओं को बढ़ा दिया है, जिससे द्विपक्षीय संबंध जटिल हो गए हैं।
परिणामस्वरूप, बांग्लादेश धीरे-धीरे भारत की रणनीतिक परिधि से बाहर होता जा रहा है, जिस पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है।
भारत और बांग्लादेश के बीच तीस्ता जल-बंटवारा समझौता लंबे समय से विवादास्पद रहा है और दोनों देशों के बीच सद्भावना बहाल करने के लिए इसे शीघ्रता से सुलझाया जाना चाहिए।
श्रीलंका और मालदीव पर ध्यान केंद्रित करने से भी यही रुझान देखने को मिलता है। दोनों ही देश भारतीय प्रभाव से दूर होते जा रहे हैं, अब श्रीलंका के बाहरी ऋण का 43% हिस्सा चीन के पास है, जबकि भारत के पास 15% है।
पिछले कई वर्षों से चीन श्रीलंका की तेल रिफाइनरी क्षमता के विस्तार का समर्थन करता रहा है और पिछले वर्ष दक्षिणी बंदरगाह में 4 अरब 50 करोड़ डॉलर की लागत वाली चीन-नेतृत्व वाली रिफाइनरी परियोजना को मंजूरी दी गई थी।
यह श्रीलंका में अब तक का सबसे महत्वपूर्ण प्रत्यक्ष विदेशी निवेश है, जो चीन के प्रभुत्व को दर्शाता है।
इसके विपरीत, दुनिया की सबसे बड़ी रिफाइनरियों सहित 23 बड़ी तेल रिफाइनरियाँ होने के बावजूद भारत को दरकिनार कर दिया गया। यही बात श्रीलंका के कंटेनर टर्मिनल विकास पर भी लागू होती है, जहाँ बंदरगाह प्रबंधन में भारत की विशेषज्ञता महत्वपूर्ण हो सकती थी, फिर भी चीन ने बढ़त बना ली।
श्रीलंका के आगामी चुनाव भारत के साथ रणनीतिक मतभेदों को और गहरा कर सकते हैं, खासकर यदि चीन समर्थक माने जाने वाले उम्मीदवार अनुरा कुमार दिसानायके जीत जाते हैं।
2022 में श्रीलंका के संप्रभु ऋण चूक के बाद, राष्ट्र चीन पर तेजी से निर्भर हो गया है, जिससे यह "ऋण-जाल कूटनीति" परिदृश्य में और अधिक धकेल दिया गया है।
मालदीव, भले ही छोटा है और इसकी आबादी करीब पांच लाख है, लेकिन इसका रणनीतिक महत्व है। चीन ने भी यहां बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं के जरिए काफी प्रगति की है, जैसे कि माले को अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से जोड़ने वाला चार लेन का पुल।
मालदीव पर चीन का 1 अरब 37 करोड़ डॉलर बकाया है, जो उसके सार्वजनिक ऋण का 40% है - विश्व बैंक के अनुसार यह आंकड़ा अस्थिर है।
श्रीलंका की तरह मालदीव पर भी चीन के ऋण जाल में फंसने का खतरा है।
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2000 से 2024 के बीच चीन ने दक्षिण एशिया के कई देशों सहित 165 निम्न व मध्यम आय वाले देशों को कुल 10 खरब 3 अरब डॉलर का ऋण दिया है।
पिछले वर्ष भारत और मालदीव के बीच तनाव तब बढ़ गया था जब मालदीव में नवनियुक्त चीन समर्थक मंत्रियों ने भारतीय प्रधानमंत्री के बारे में अपमानजनक टिप्पणी की थी, जिसके कारण भारत में “मालदीव का बहिष्कार” ( Maldives boycott ) अभियान चलाया गया था।
इसके बाद मालदीव के राष्ट्रपति ने पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए चीन का रुख किया, जिससे क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव का पता चला।
वर्ष 2000 से 2024 के बीच चीन ने दक्षिण एशिया के कई देशों सहित 165 निम्न व मध्यम आय वाले देशों को कुल 10 खरब 3 अरब डॉलर का ऋण दिया है।
इसने चीन को इनमें से 75% देशों पर अपना प्रभाव स्थापित करने में सक्षम बनाया है।
इसके विपरीत, भारत ऐतिहासिक संबंधों, भौगोलिक निकटता और सांस्कृतिक संबंधों पर निर्भर करता है, जो चीन की आर्थिक शक्ति का मुकाबला करने में अपर्याप्त साबित होते हैं।
भारत की विदेश नीति और कूटनीति धीमी और नौकरशाहीपूर्ण रही है, जो चीन के आक्रामक विस्तार का मुकाबला करने में विफल रही है।
भारत अब 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध में अपनी ऐतिहासिक भूमिका या दशकों पहले मालदीव में लोकतंत्र बहाल करने के अपने प्रयासों पर निर्भर नहीं रह सकता।
चीन के साथ प्रतिस्पर्धा करने तथा अपने पड़ोसियों के साथ संबंध बनाने के लिए भारत को अधिक चुस्त और रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाना होगा।
इसके अलावा, भारत और चीन के बीच सैन्य क्षमताओं में अंतर बढ़ता जा रहा है।
चीन हर साल अपने शस्त्रागार में लगभग 240 युद्धक विमान शामिल कर रहा है, जबकि भारत सिर्फ 22 विमान शामिल करने के लिए संघर्ष कर रहा है। रक्षा तैयारियों में यह असमानता भारत के लिए अपने क्षेत्रीय प्रभाव को बनाए रखने में चुनौतियों की एक स्पष्ट याद दिलाती है।
निष्कर्ष के तौर पर, चीन और भारत के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा तेज़ होती जा रही है। आर्थिक नीति और बुनियादी ढांचे में निवेश के ज़रिए चीन ने दक्षिण एशिया में अपने प्रभाव को काफ़ी हद तक बढ़ाया है, जो भारत के पारंपरिक कूटनीतिक दृष्टिकोण से काफ़ी आगे निकल गया है।
भारत को इस क्षेत्र में अपनी स्थिति बनाए रखने के लिए अपनी विदेश नीति की फिर से जांच करनी होगी , अपनी कूटनीतिक चपलता को बढ़ाना होगा और हिन्द महासागर में चीन के बढ़ते दबदबे से मुकाबला करने के तरीके ढूंढने होंगे।
* हार्ड पावर का अर्थ है किसी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सैन्य बल का प्रयोग करने की धमकी के माध्यम से दवाब डालना।
*आर्थिक शासन कला उन विभिन्न आर्थिक साधनों का वर्णन करती है जिनका उपयोग देश अपनी विदेश नीति प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाने के लिए करते हैं - जैसे ऋण, विदेशी सहायता, प्रतिबंध और व्यापार समझौते।
कुछ उपकरण दबाव के माध्यम से दूसरे देशों को प्रभावित करने के लिए बनाए जाते हैं। उदाहरण के लिए, प्रतिबंधों का उद्देश्य उन देशों पर दबाव डालना या उन्हें दंडित करना होता है जो अंतरराष्ट्रीय मानदंडों का उल्लंघन करते हैं या किसी सरकार के हितों को ख़तरा पैदा करते हैं।
इस बीच, अन्य आर्थिक उपकरण दबाव के माध्यम से कम और आकर्षण के माध्यम से अधिक प्रभाव डालते हैं। उदाहरण के लिए, देश अपने संबंधों को बेहतर बनाने के लिए व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर करते हैं।
ये समझौते आम तौर पर टैरिफ कम करते हैं और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने वाले विनिमय को प्रोत्साहित करते हैं।
अन्य उपकरण जैसे ऋण (ब्याज के साथ चुकाया जाने वाला धन) और विदेशी सहायता (धन, सेवाएँ, या भौतिक सामान जो एक देश दूसरे को उपहार में देता है) राजनयिक संबंधों और सद्भावना में सुधार को प्रेरित कर सकते हैं। अर्थशास्त्र के उपकरण जलवायु परिवर्तन , साइबर अपराध , आतंकवाद , परमाणु प्रसार और महामारी जैसे महत्वपूर्ण वैश्विक मुद्दों पर देशों के बीच सहयोग को भी बढ़ावा दे सकते हैं ।
चीन देश की विदेश नीति के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए आर्थिक नीति-विशेष रूप से बीआरआई ऋण का लाभ उठाता है।
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