क्या भारत 'क्लेप्टोक्रेसी' (भ्रष्ट तंत्र) के साये में जा रहा है ?
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क्या भारत 'क्लेप्टोक्रेसी' (भ्रष्ट तंत्र) के साये में जा रहा है ?
भारत अभी पूरी तरह से एक 'क्लेप्टोक्रेसी' (यानी भ्रष्ट नेताओं और व्यापारियों द्वारा लूटा जाने वाला देश) नहीं बना है, लेकिन उसकी परछाईं साफ दिखाई देने लगी है। भारतीय लोकतंत्र को बचाने के लिए इन कमियों को सुधारना बेहद ज़रूरी है।
1. सरकार, कंपनियाँ और जनता का पैसा:
लेख चेतावनी देता है कि भले ही भारत अभी पूरी तरह भ्रष्ट और लुटेरी व्यवस्था नहीं बना है, लेकिन सरकार की ताकत, बड़ी-बड़ी प्राइवेट कंपनियों (Corporate) के बढ़ते असर और जनता के पैसे के बीच का अंतर अब धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है, जिसे नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है।
2. इलेक्टोरल बॉन्ड (Electoral Bonds) का बड़ा विवाद:
इस चिंता के केंद्र में 'इलेक्टोरल बॉन्ड ' का मामला है। इस व्यवस्था को शुरुआत में एक बड़े सुधार (Reform) के रूप में जनता के सामने पेश किया गया था, लेकिन असल में इसने बड़ी-बड़ी कंपनियों द्वारा राजनैतिक पार्टियों को दिए जाने वाले अरबों रुपये के चंदे (Donations) को जनता की नज़रों से छिपाने (शील्ड करने) का काम किया।
3. पसंदीदा उद्योगपतियों को फायदा और संस्थाओं पर दबाव:
कुछ चुनिंदा और पसंदीदा बड़े व्यापारिक घरानों (Conglomerates) का तेज़ी से आगे बढ़ना, केवल विरोधियों के खिलाफ चुनिंदा सरकारी जाँचें (जैसे ED या CBI) होना और निष्पक्ष रहने वाली सरकारी संस्थाओं पर बढ़ता दबाव एक बड़े खतरे की तरफ इशारा करता है।
खतरा यह है कि आज के दौर में जो कोई भी सरकार के करीब है, वह जवाबदेही से आसानी से बच सकता है।
4. भारत के लोकतांत्रिक 'शॉक एब्जॉर्बर' (सुरक्षा कवच):
इन सब कमियों के बावजूद, भारत के लोकतंत्र के पास आज भी कुछ बहुत मजबूत सुरक्षा कवच (Shock absorbers) मौजूद हैं, जो देश को डूबने से बचाते हैं। जैसे—यहाँ होने वाले कड़े और प्रतिस्पर्धी चुनाव, एक
मजबूत और स्वतंत्र अदालत (Judiciary), सीधे जनता तक मदद पहुँचाने वाला डिजिटल वेलफेयर सिस्टम, यूपीआई (UPI - डिजिटल पेमेंट), टैक्स सुधार और हर क्षेत्र में हो रहे नए-नए आविष्कार (Innovation economy)।
5. अंतिम कड़वा निष्कर्ष:
लेख का सबसे मुख्य संदेश बिल्कुल साफ है—भारत का लोकतंत्र आज भी ज़िंदा है और यहाँ बदलाव की लड़ाई जारी है। लेकिन, अगर पैसे और सत्ता की ताकत को कुछ ही लोगों के हाथों में इकट्ठा होने से नहीं रोका गया, तो यह अंदर ही अंदर हमारे लोकतंत्र को पूरी तरह खोखला कर देगा।
जून 2026
क्या होता है 'क्लेप्टोक्रेसी' (Kleptocracy) ?
राजनीति विज्ञान (Political Science) की शब्दावली में कभी-कभी ऐसे शब्द सामने आते हैं जो हमें गहराई से सोचने पर मजबूर करते हैं और व्यवस्था की असलियत को साफ़ दिखाते हैं। ऐसा ही एक शब्द है—"क्लेप्टोक्रेसी" (Kleptocracy), जिसका सीधा और शाब्दिक अर्थ होता है "चोरों का शासन या चोर-तंत्र"।
आमतौर पर इस शब्द का इस्तेमाल उन सरकारों या देशों के लिए किया जाता है, जहाँ सत्ता में बैठे बड़े नेता और अधिकारी देश के सरकारी खजाने और जनता के पैसों (Public resources) को चुपचाप लूटकर अपने निजी फायदे के लिए इस्तेमाल करने लगते हैं।
इतिहास में यह नाम ज़्यादातर सैन्य तानाशाहियों (Military dictatorships), प्राकृतिक संसाधनों (जैसे तेल या सोने) से भरपूर तानाशाह देशों और उन देशों को दिया गया है जहाँ लोकतंत्र पूरी तरह खत्म हो चुका है।
भारत इस श्रेणी में फिट क्यों नहीं बैठता ?
हमारा देश भारत इस तरह के चोर-तंत्र वाले देशों की श्रेणी में आसानी से फिट नहीं बैठता। भारत आज भी एक बहुत बड़ा, जीवंत और शोर-शराबे से भरा हुआ लोकतंत्र है।
यहाँ दुनिया के सबसे बड़े चुनाव कराए जाते हैं, यहाँ का समाज और मीडिया बहुत सक्रिय है, और यहाँ आज भी ऐसी सरकारी संस्थाएँ मौजूद हैं जो काफी हद तक आज़ाद (Autonomy) होकर अपना काम करती हैं।
इसके अलावा, यह भी समझना ज़रूरी है कि केवल देश के धन या व्यापार का कुछ बड़े लोगों के हाथों में इकट्ठा होना (Economic concentration), सीधे तौर पर भ्रष्टाचार (Corruption) नहीं कहलाया जा सकता।
फिर भी चिंता की बात क्यों है?
इन सब सकारात्मक बातों के बावजूद, आज एक बड़ा और गंभीर सवाल हमारे सामने खड़ा है जिसकी बारीकी से जाँच होनी चाहिए:
"क्या भारत की राजनीति और अर्थव्यवस्था के भीतर धीरे-धीरे कुछ ऐसे लक्षण या कमियाँ दिखने लगी हैं, जो आमतौर पर एक भ्रष्ट शासन व्यवस्था (Kleptocratic system) वाले देशों में पाई जाती हैं?"
असली चिंता भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि सत्ता का एक जगह सिमटना है
यह चिंता सिर्फ इसलिए नहीं है कि देश में भ्रष्टाचार मौजूद है। भ्रष्टाचार तो भारत में बहुत लंबे समय से एक बड़ी चुनौती रहा है और यह आज की मौजूदा सरकार के आने से कई दशक पहले से चला आ रहा है।
बल्कि असली बहस इस बात पर है कि क्या आज हमारे देश की आर्थिक (पैसा) और राजनैतिक ताकत कुछ ही लोगों के हाथों में इस कदर इकट्ठी होती जा रही है, जो हमारी जवाबदेही को कमज़ोर कर रही है और पूरी व्यवस्था को कुछ चुनिंदा रसूखदार लोगों के फायदे के लिए झुका रही है।
इलेक्टोरल बॉन्ड का बड़ा विवाद
हाल के वर्षों में सबसे ज़्यादा विवादित चीज़ 'इलेक्टोरल बॉन्ड ' (Electoral Bonds) योजना थी। इसे शुरुआत में सरकार द्वारा एक ऐसे तरीके के रूप में पेश किया गया था जो राजनैतिक चंदे में काले धन को साफ करेगा।
लेकिन, इस योजना ने आखिरकार बड़ी-बड़ी कंपनियों और अमीर लोगों को बिना अपना नाम बताए राजनैतिक पार्टियों को अरबों रुपये का चंदा देने की कानूनी छूट दे दी।
जब साल 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने इस योजना को असंवैधानिक मानकर पूरी तरह रद्द कर दिया, तो उसके बाद जो जानकारियाँ बाहर आईं, उसने सबको चौंका दिया।
उन आँकड़ों ने साफ कर दिया कि राजनीति को चलाने के लिए बड़ी-बड़ी प्राइवेट कंपनियों से कितना भारी मात्रा में पैसा राजनैतिक दलों के पास जा रहा था।
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चंदा और सरकारी जाँच का अजीब तालमेल
आलोचकों और जानकारों के लिए सबसे ज़्यादा परेशान करने वाली बात यह थी कि चंदा देने वाली कुछ कंपनियों और उन कंपनियों के बीच एक अजीब सा संबंध दिखा, जिन पर ठीक उसी दौरान सरकारी एजेंसियों (जैसे ED या CBI) की जाँच या टैक्स के छापे चल रहे थे।
भले ही इस बात के सीधे सबूत मिले हों या न मिले हों कि चंदा देने के बदले कंपनियों को सीधे तौर पर कोई फायदा पहुँचाया गया (Quid pro quo यानी 'तुम मुझे चंदा दो, मैं तुम्हें सरकारी राहत दूँगा'), लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने देश में पारदर्शिता और लोकतंत्र में जनता के प्रति जवाबदेही पर बहुत बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
कुछ बड़ी कंपनियों का दबदबा
इस पूरी बहस से जुड़ी एक और बड़ी बात यह है कि देश में कुछ बहुत बड़े व्यापारिक घरानों (Corporate conglomerates) का तेज़ी से विकास हुआ है।
इनका यह उभार ठीक उसी समय हुआ है जब सरकार बुनियादी ढांचे (जैसे सड़क, बिजली) और औद्योगिक विकास को बहुत भारी सरकारी समर्थन दे रही है।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारत को अपने बंदरगाहों , हवाई अड्डों, रिन्यूएबल एनर्जी (सौर और पवन ऊर्जा) के प्रोजेक्ट्स, लॉजिस्टिक्स नेटवर्क और फैक्ट्रियों को बढ़ाने के लिए बहुत बड़े निवेश (पैसे) की ज़रूरत है।
कानून का अलग-अलग इस्तेमाल और उसका खतरा
लेकिन चिंता तब शुरू होती है, जब देश की इन महत्वपूर्ण संपत्तियों (Assets) का एक बहुत बड़ा हिस्सा कुछ गिने-चुने व्यापारिक घरानों को ही मिलता हुआ दिखाई देता है।
जब आम जनता को ऐसा लगने लगता है कि कानून का पालन सबके लिए बराबर नहीं हो रहा है, बल्कि कुछ लोगों को फायदा पहुँचाने के लिए इसमें ढील दी जा रही है, तो इससे हमारी सरकारी संस्थाओं पर से जनता का भरोसा कमज़ोर हो जाता है।
बाज़ार का मुकाबला बनाम राजनैतिक संरक्षण
यह सच है कि देश की ज़्यादातर दौलत का कुछ ही लोगों के पास होना सीधे तौर पर भ्रष्टाचार नहीं है।
लेकिन, जब किसी कंपनी की व्यापारिक सफलता इस बात पर निर्भर करने लगे कि उसके राजनैतिक संबंध (Political power तक पहुँच) कितने मजबूत हैं, तो असली बाज़ार की प्रतियोगिता (Market competition) और राजनैतिक संरक्षण (Political patronage - सरकार की छत्रछाया) के बीच का अंतर खत्म होने लगता है।
चोर-तंत्र (Kleptocracy) का काम करने का तरीका
एक कामयाब चोर-तंत्र (लुटेरी व्यवस्था) देश की अर्थव्यवस्था में जनता को सिर्फ उतना ही देता है जिससे कि आम जनता सरकार के खिलाफ विद्रोह न करे, या फिर वह अपनी दमनकारी सुरक्षा एजेंसियों (पुलिस और सेना) के दम पर सुरक्षित रहता है ताकि किसी भी आंदोलन या विद्रोह को बल प्रयोग करके कुचला जा सके।
ज़ाहिर सी बात है कि अगर किसी के पास असीमित और पूर्ण शक्ति हो, तो उसके लिए देश के सारे संसाधनों और पैसों पर अपना कब्ज़ा बनाए रखना बहुत आसान हो जाता है।
जाँच एजेंसियों की भूमिका और उनका डर
चिंता का एक और बड़ा कारण हमारी जाँच संस्थाएँ हैं। 'प्रवर्तन निदेशालय' (ED) और 'केंद्रीय जांच ब्यूरो' (CBI) जैसी एजेंसियां देश से भ्रष्टाचार और आर्थिक अपराधों (घोटालों) को मिटाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
लेकिन, इन एजेंसियों की साख (Credibility) इस बात पर टिकी होती है कि जनता को उनकी निष्पक्षता (Impartiality) पर कितना भरोसा है।
अफ़सोस की बात यह है कि आज के समय में इन संस्थाओं का निष्पक्ष होना तो दूर, समाज में इनका एक तरह का डर (Dread) बैठ गया है।
चुनिंदा कार्रवाई और दलबदल का खेल
आलोचकों और जानकारों का कहना है कि आज इन एजेंसियों की ज़्यादातर जाँचें केवल विपक्ष के नेताओं के खिलाफ ही सिमट कर रह गई हैं।
इसके साथ ही, एक और परेशान करने वाला तरीका सामने आता है—जैसे ही कोई आरोपी नेता अपनी पार्टी बदलकर सरकार के पाले में आ जाता है , वैसे ही उसके खिलाफ चल रही जाँचें अचानक सुस्त पड़ जाती हैं या ठंडे बस्ते में डाल दी जाती हैं।
इससे आम जनता के बीच यह संदेश जाता है कि कानून का इस्तेमाल सबके लिए बराबर नहीं, बल्कि चुन-चुनकर किया जा रहा है।
भले ही किसी एक मामले में कानूनी तौर पर आरोप सही भी हों, लेकिन जब लोगों को यह दिखने लगता है कि कानून का पालन सबके लिए एक जैसा नहीं हो रहा है, तो इससे हमारी इन महत्वपूर्ण संस्थाओं की कानूनी मान्यता और साख समाज में बहुत कमज़ोर हो जाती है।
लोकतांत्रिक संतुलन (नियंत्रण और संतुलन) पर खतरा
यह बहस केवल किसी एक या दो एजेंसियों की कमज़ोरी तक सीमित नहीं है। बल्कि यह हमारे लोकतंत्र के उस बड़े बुनियादी ढांचे पर सवाल खड़ा करती है जिसे हम 'नियंत्रण और संतुलन' (Checks and balances) कहते हैं—यानी जहाँ सरकार का कोई भी अंग अपनी ताकत का गलत इस्तेमाल न कर सके और हर संस्था एक-दूसरे पर नजर रख सके।
नियंत्रण और संतुलन (Checks and Balances) का कमज़ोर होना
कोई भी लोकतांत्रिक व्यवस्था सिर्फ चुनाव करा देने से मजबूत नहीं बनती। लोकतंत्र इस बात पर भी निर्भर करता है कि देश की आज़ाद संस्थाएँ सरकार की असीमित ताकतों और फैसलों की कितनी कड़ाई से जाँच (Scrutinising) कर पाती हैं।
पिछले कुछ समय से देश की कई महत्वपूर्ण संस्थाओं की आज़ादी (Autonomy) पर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं—जैसे बाज़ार पर नज़र रखने वाली संस्थाएँ (Regulatory bodies), चुनाव आयोग (Election Commission), मीडिया का एक बड़ा हिस्सा और यहाँ तक कि हमारी न्यायपालिका (Judiciary) भी।
हालांकि ये संस्थाएँ आज भी काम कर रही हैं और कभी-कभी सरकार के फैसलों को चुनौती भी देती हैं, फिर भी जानकारों को डर है कि सरकार के लगातार राजनैतिक दबाव के कारण धीरे-धीरे इन संस्थाओं के काम करने की ताकत और असर कम हो सकता है।
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देश में बढ़ती भारी आर्थिक असमानता (Economic Inequality)
इन सब सरकारी संस्थाओं की चिंताओं के पीछे एक और बहुत बड़ी वजह छिपी है—वह है अमीर और गरीब के बीच बढ़ती खाई। धन-दौलत के बँटवारे पर हुए हाल के कई अध्ययनों से पता चलता है कि आज भारत में अमीरी का कुछ ही हाथों में सिमट जाना (Concentration) इतिहास में पिछले कई दशकों में सबसे ज़्यादा हो चुका है।
आज हमारे देश में एक तरफ तो कुछ लोगों के पास दुनिया की सबसे बड़ी और आलीशान दौलत (Private wealth) इकट्ठा हो गई है, और दूसरी तरफ देश की एक बहुत बड़ी आबादी आज भी अनाज, राशन और रोज़गार जैसी सरकारी कल्याणकारी योजनाओं (Public welfare schemes) पर पूरी तरह निर्भर है।
यह दोनों स्थितियाँ एक साथ होना हमारे समाज के एक बहुत बड़े विरोधाभास (Striking paradox) को दिखाती हैं।
केवल आर्थिक असमानता होने से ही कोई देश चोर-तंत्र (Kleptocracy) नहीं बन जाता।
लेकिन, खतरा तब होता है जब यह भारी पैसा राजनैतिक ताकत को भी अपने इशारों पर नचाने लगे। ऐसा होने से आम जनता की लोकतांत्रिक बराबरी (Democratic equality) खत्म हो जाती है, क्योंकि फिर गरीब की वोट की कीमत अमीर के पैसे के आगे कमज़ोर पड़ जाती है।
चोर-तंत्र (Kleptocracy) के अंदरूनी हिस्से का सच
एक 'अच्छी तरह से चलने वाला' चोर-तंत्र अपनी व्यवस्था को इसी तरह बनाए रखता है—वह देश के सभी मोटी कमाई वाले धंधों और प्राकृतिक संसाधनों (जैसे कोयला, ज़मीन, खदानें) पर पूरी तरह अपना कब्ज़ा जमा लेता है।
ऐसी भ्रष्ट व्यवस्था का जो मुख्य मुखिया (राजा या नेता) होता है, वह अपने अमीर दोस्तों और रसूखदार साथियों के बीच देश की इस लूटी हुई संपत्ति (Spoils) को बराबर-बराबर बाँट देता है, ताकि उसके अमीर और ताकतवर साथियों के बीच आपस में कोई लड़ाई-झगड़ा (Intra-elite conflict) न हो और उसका राज आसानी से चलता रहे।
तस्वीर का केवल एक पक्ष देखना गलत होगा
लेकिन, अपनी चर्चा को केवल कमियों पर ही रोक देना सही नहीं होगा, क्योंकि यह तस्वीर का सिर्फ एक पहलू (One side of the picture) होगा। भारत के पास कुछ ऐसे बहुत मजबूत सुरक्षा कवच और नियम (Safeguards) भी हैं, जो इसे दुनिया के असल चोर-तंत्र (Kleptocratic) वाले देशों से बिल्कुल अलग और बेहतर बनाते हैं।
डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (डिजिटल क्रांति) की ताकत
भारत का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच है—यहाँ का बहुत बड़ा डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (Digital Public Infrastructure)।
सरकार ने 'जनधन बैंक खातों', सरकारी पहचान पत्र (डिजिटल आईडी) और मोबाइल नेटवर्क को आपस में जोड़कर 'डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर' (Direct Benefit Transfer - DBT) का बहुत बड़ा जाल फैलाया है।
लोकतंत्र कभी भी एक रात में खत्म नहीं होते। आज देश में मिलने वाली सरकारी सब्सिडी, पेंशन, छात्रवृत्ति (Scholarships) और अन्य कल्याणकारी योजनाओं का पैसा अब सीधे गरीब जनता के बैंक खातों में पहुँचता है।
इसके लिए उन्हें भ्रष्ट अधिकारियों या बिचौलियों (Bureaucratic layers) के चक्कर नहीं काटने पड़ते। इस डिजिटल सुधार ने पैसों की चोरी (Leakage) और भ्रष्टाचार को बहुत हद तक कम किया है, जिससे हमारी सरकारी व्यवस्था की ताकत बढ़ी है और काम में पारदर्शिता (Transparency) आई है।
जनता के हाथ में वोट की ताकत
भारत की चुनाव व्यवस्था यहाँ का दूसरा सबसे बड़ा और मजबूत सुरक्षा कवच है। दुनिया के आम चोर-तंत्र वाले देशों में या तो चुनाव होते ही नहीं हैं, या फिर वहाँ पहले से तय होता है कि कौन जीतेगा (जैसे तानाशाही देशों में)। लेकिन भारत में ऐसा बिल्कुल नहीं है।
यहाँ की जागरूक जनता चुनाव के समय काम न करने वाले नेताओं और सत्तारूढ़ सरकारों (Incumbents) को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा देती है।
हमारे देश में राजनैतिक मुकाबला आज भी बहुत कड़ा और दमदार है। राज्यों की क्षेत्रीय पार्टियां (Regional parties) बहुत मजबूत हैं और आज भी कोई भी पार्टी यह दावे से नहीं कह सकती कि चुनाव वही जीतेगी।
चुनाव के नतीजों का यह अनिश्चित होना (Uncertainty) ही यह साबित करता है कि आज भी हमारे देश में लोकतंत्र पूरी तरह ज़िंदा और सच्चा है।
न्यायपालिका का कड़ा रुख (Judicial Intervention)
हमारे देश की न्यायपालिका (अदालतों) ने भी समय-समय पर सरकार के फैसलों के खिलाफ खड़े होने और अपनी आज़ादी दिखाने की मजबूत क्षमता (Institutional resistance) दिखाई है। इसके कुछ बड़े उदाहरण निम्नलिखित हैं:
अदालतों द्वारा केंद्रीय जाँच एजेंसियों को 'पिंजरे में बंद तोता' (Caged parrot - यानी सरकार के इशारों पर नाचने वाली) कहना।
दिल्ली के मुख्यमंत्री के शराब नीति मामले में दिल्ली हाई कोर्ट के जज का खुद को केस से अलग (Recusal) कर लेना।
और सबसे ताज़ा उदाहरण, 'न्यूज़क्लिक' (Newsclick) मामले में अदालत द्वारा आरोपी को बरी (Acquittal) करना और पुराने फैसले को पलटना।
इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को पूरी तरह रद्द करना, नागरिकों की आज़ादी (Civil liberties) की रक्षा के लिए बीच में दखल देना, और देश में खोजी पत्रकारिता (Investigative journalism) व स्वतंत्र डिजिटल मीडिया का लगातार काम करते रहना—यह दिखाता है कि हमारे लोकतंत्र के सुरक्षा कवच आज भी पूरी तरह एक्टिव (सक्रिय) हैं।
स्वतंत्र मीडिया और यूट्यूबर्स पर दबाव
आज देश में कई ऐसे आज़ाद यूट्यूब न्यूज़ चैनल मौजूद हैं जो ज़मीनी हकीकत (Ground reporting) दिखाते हैं, लेकिन वे बहुत ज़्यादा सरकारी दबाव में काम कर रहे हैं। नतीजा यह है कि सरकार को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने में उनका असर आज बहुत कम (Negligible) रह गया है।
इन स्वतंत्र इंफ्यूएंसर्स (Influencers) को कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। उदाहरण के लिए—नए आईटी (IT) और डिजिटल कानून के तहत एक बेहद लोकप्रिय "खे खे" (Khe khe) वीडियो को यूट्यूब से हटा दिया गया, जिसे लगभग 1.6 करोड़ लोग देख चुके थे।
डिजिटल इंडिया बनाम काला धन
भारत सरकार द्वारा उठाए गए बड़े कदम—जैसे जीएसटी (GST - वस्तु एवं सेवा कर), यूपीआई (UPI) के ज़रिए होने वाले डिजिटल पेमेंट, और व्यापार को पूरी तरह से कानूनी कागज़ों में लाना (Formalisation)—इन सबने पैसों के लेनदेन को बिल्कुल साफ, पारदर्शी और ट्रैक करने योग्य (Traceable) बना दिया है।
आमतौर पर जो चोर-तंत्र (Kleptocratic systems) होते हैं, वे ऐसे माहौल में फलते-फूलते हैं जहाँ सारा काम छिपे हुए तरीके से और केवल नकद (Cash) में होता है। ऐसे में भारत का डिजिटल रास्ते पर आगे बढ़ना बड़े पैमाने पर होने वाली पैसों की चोरी के आगे एक बहुत बड़ा रोड़ाखड़ा करता है।
पॉलिसी (नीति) के ज़रिए लूट का खतरा
डिजिटल पेमेंट से आम चोरी तो रुक सकती है, लेकिन बड़े स्तर पर लूट तब तक नहीं रुक सकती जब तक कि चोर-तंत्र खुद सरकार की नीतियों का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए न करने लगे।
उदाहरण के लिए—हाल ही में माइनिंग (खनन) की नई सरकारी नीतियों को दी गई मंज़ूरी के बाद, अरावली की पूरी पर्वत श्रृंखला को ही खोद डालने (माइनिंग करने) का एक बड़ा डर और खतरा पैदा हो गया था।
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भारत की आर्थिक ताकत का असली आधार
इसके साथ ही, भारत के आर्थिक विकास (Economic growth) के तरीके को समझना भी बेहद ज़रूरी है। दुनिया के ज़्यादातर पूरी तरह भ्रष्ट चोर-तंत्र (Total kleptocratic regimes) वाले देश तेल, खनिज (Minerals) या अन्य प्राकृतिक संसाधनों की लूट पर टिके होते हैं।
लेकिन भारत ऐसा नहीं है। भारत की आर्थिक ताकत और तेज़ी—टेक्नोलॉजी, सर्विस सेक्टर (IT), दवाइयों (Pharmaceuticals), नए स्टार्टअप्स (Entrepreneurship) और आधुनिक मैन्युफैक्चरिंग (फैक्ट्रियों) से आती है।
इन क्षेत्रों में कामयाबी पाने के लिए नए आविष्कारों , कुशल लोगों और वैश्विक बाज़ारों से जुड़ाव की ज़रूरत होती है। इस तरह के आर्थिक ढांचे को सीधे तौर पर लूटना या हड़पना किसी भी सरकार या चोर-तंत्र के लिए इतना आसान नहीं होता।
असली चुनौती क्या है?
इसलिए, सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि भारत आज एक चोर-तंत्र (Kleptocracy) बन चुका है या नहीं। हमारे पास ऐसे कोई सबूत नहीं हैं जो इस बात को सच साबित करें।
बल्कि, सबसे ज़रूरी और सही सवाल यह है कि: "क्या भारत की लोकतांत्रिक संस्थाएँ (जैसे अदालतें और चुनाव आयोग) भविष्य में भी राजनैतिक ताकत और अमीर उद्योगपतियों के इस खतरनाक गठजोड़ को रोकने में कामयाब रहेंगी?"
लोकतंत्र कभी एक रात में खत्म नहीं होता
इतिहास हमें एक बहुत बड़ा सबक सिखाता है। कोई भी लोकतंत्र कभी एक रात में अचानक बर्बाद नहीं होता।
सरकारी संस्थाओं का कमज़ोर होना (Institutional erosion) धीरे-धीरे होता है, जब समाज में चीज़ों को छिपाना सामान्य मान लिया जाता है, सारी ताकत कुछ ही हाथों में सिमट जाती है, सरकार पर नज़र रखने
वाली संस्थाएँ ढीली पड़ जाती हैं और व्यापार की सफलता इस बात पर निर्भर करने लगती है कि आपकी नेताओं से कितनी जान-पहचान है।
ठीक इसी तरह, लोकतंत्र की मजबूती भी कुछ खास चीज़ों से वापस आती है—जैसे सक्रिय अदालतें, कड़े चुनाव, निष्पक्ष पत्रकारिता, पारदर्शी सरकार और देश के जागरूक नागरिक।
चेतावनी के संकेतों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता
आज भारत इन दोनों ताकतों (मजबूत लोकतंत्र और कमज़ोर होती संस्थाओं) के ठीक बीच में खड़ा है। हालांकि भारत की लोकतांत्रिक नींव आज भी इतनी मजबूत है कि कोई इसे पूरी तरह अपने कब्ज़े में नहीं ले सकता, फिर भी राजनीति और अर्थशास्त्र के विद्वान जिन खतरों की तरफ इशारा कर रहे हैं, उन्हें खारिज नहीं किया जा सकता।
बड़े-बड़े व्यापारिक घरानों और राजनैतिक सत्ता के बीच बढ़ती करीबी, सिर्फ राजनैतिक विरोधियों को चुन-चुनकर निशाना बनाना और चुनिंदा बिजनेसमैन को देश की सरकारी संपत्तियों को चलाने की छूट देना—ये ऐसे खतरे हैं जो हमारी व्यवस्था को अंदर से कमज़ोर कर सकते हैं और यह आज एक बड़ी चिंता का विषय है।
इसलिए सबसे बड़ा सवाल ये है कि, "क्या भारत में भ्रष्ट नेताओं और अफसरों का राज (चोर-तंत्र) कायम हो रहा है? यह सवाल आने वाले दशकों में भारतीय लोकतंत्र की दशा और दिशा तय करने वाला है।"
..... समाप्त
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