एल्गोरिदम के जाल में बचपन: भारत की बेरुखी
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एल्गोरिदम के जाल में बचपन: भारत की बेरुखी
विस्तृत जानकारी : आज के दौर में बच्चों का रोज़ाना 6 से 8 घंटे गेम खेलना, पढ़ाई में पिछड़ना और मानसिक तनाव झेलना अब कोई मामूली बात नहीं रह गई है। यह एक गंभीर संकट बन चुका है।
समस्या अब केवल किताबी नहीं रही: सोशल मीडिया बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, एकाग्रता (attention), नींद और भावनाओं पर बुरा असर डाल रहा है। अब इस पर कड़े नियम बनाने में देरी करने का कोई बहाना नहीं बचा है।
नुकसान की असली वजह प्लेटफॉर्म की बनावट है, न कि माता-पिता की नाकामी: बच्चों को लग रही यह लत माता-पिता की असफलता नहीं है।
'इनफिनिट स्क्रॉल' (लगातार नीचे खिसकाते रहना) और 'एल्गोरिदम' बच्चों के दिमाग को इस तरह उलझाते हैं कि वे चाहकर भी इसे छोड़ नहीं पाते, क्योंकि उनका दिमाग अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुआ है।
ऑस्ट्रेलिया ने नियमों के मामले में एक बड़े बदलाव (मोड़) का संकेत दिया है: ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगा दी है। खास बात यह है कि इसकी ज़िम्मेदारी बच्चों या माता-पिता पर नहीं, बल्कि उन कंपनियों (प्लेटफ़ॉर्म्स) पर डाली गई है।
भारत में नियमों की स्थिति अब भी खतरनाक रूप से बेहद कमज़ोर है: भारत में बच्चे सोशल मीडिया, गेमिंग की लत और एड-टेक (Ed-tech) कंपनियों के विज्ञापनों का बुरी तरह शिकार हो रहे हैं, फिर भी यहाँ उम्र की कोई सीमा या कंपनियों की जवाबदेही तय करने वाले सख्त नियम नहीं हैं।
नियमों का मकसद पाबंदी लगाना नहीं, बल्कि सही समय तय करना है: इसका मतलब तकनीक पर पूरी तरह पाबंदी लगाना नहीं है, बल्कि बच्चों को सही उम्र तक इससे बचाना है। यह सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वह बच्चों के बचपन को व्यापारिक फायदों के लिए बिकने से बचाए।
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जनवरी 2025
तकनीक को नियंत्रित करने का हर गंभीर प्रयास एक 'ढांचागत विरोधाभास' (structural paradox) में फंस जाता है, जिसे सबसे पहले डेविड कोलिंग्रिज ने 1980 में अपनी कृति 'द सोशल कंट्रोल ऑफ टेक्नोलॉजी' में स्पष्ट किया था।
'कोलिंग्रिज दुविधा' (Collingridge Dilemma) यह मानती है कि तकनीक पर नियम बनाना ठीक उसी समय सबसे कठिन होता है जब इसकी सबसे ज्यादा ज़रूरत होती है।
शुरुआती दौर में: जब कोई तकनीक अपने शुरुआती चरण में होती है, तो उसके दूरगामी प्रभाव अनिश्चित होते हैं, जिससे उस पर नियम बनाना 'समय से पहले' की गई जल्दबाज़ी जैसा लगता है।
बाद के दौर में: जब उसके नुकसान पूरी तरह से दिखने लगते हैं, तब तक वह तकनीक समाज में गहराई से जड़ें जमा चुकी होती है, अर्थव्यवस्था के लिए अनिवार्य बन जाती है और उसे राजनीतिक संरक्षण मिलने लगता है। ऐसे में किसी भी तरह का हस्तक्षेप (बदलाव) भारी उथल-पुथल मचाने वाला और महंगा साबित होता है।
आज सोशल मीडिया का नियमन (regulation) पूरी तरह से इसी दुविधा के बीच फंसा हुआ है। पिछले दो दशकों के अधिकांश समय में, सरकारों ने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को केवल एक सामान्य माध्यम (neutral tools) माना, जिनके सामाजिक परिणामों के बारे में पहले से जानना असंभव समझा गया।
अब वह अनिश्चितता का दौर खत्म हो चुका है। बच्चों पर सोशल मीडिया के प्रभाव अब केवल 'किताबी' या 'काल्पनिक' खतरे नहीं रह गए हैं। वे प्रमाणित हैं, उन्हें मापा जा चुका है और वे आज की कड़वी सच्चाई हैं।
अब जो बात अनसुलझी रह गई है, वह उस दुविधा (Dilemma) का दूसरा हिस्सा है: क्या लोकतांत्रिक देशों के पास इतनी राजनैतिक इच्छाशक्ति है कि वे किसी तकनीक के शक्तिशाली हो जाने के बाद भी उसे नियंत्रित कर सकें?
16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट रखने पर रोक लगाने का ऑस्ट्रेलिया का फैसला, इस वैश्विक सोच और बदलाव के दौर में एक महत्वपूर्ण मोड़ है।
यह फैसला पूरी तरह दोषरहित (Flawless) नहीं है, लेकिन यह तकनीक नीति (Technology Policy) के क्षेत्र में एक ऐसी चीज़ को दर्शाता है जो अब बहुत कम देखने को मिलती है: देर से ही सही, लेकिन दृढ़ता से कदम उठाने की इच्छाशक्ति।
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बचपन: एकतरफा युद्ध का मैदान
सोशल मीडिया के लिए "सही उम्र" क्या हो, इस बहस को अक्सर केवल माता-पिता की पसंद या बच्चे की समझदारी के मामले के रूप में देखा जाता है। समस्या को इस तरह पेश करना न केवल परेशान करने वाला है, बल्कि बहुत भ्रामक (गलत) भी है।
यह सोच मान लेती है कि बच्चों और इन प्लेटफॉर्म्स के बीच का मुकाबला बराबरी का है।
जबकि हकीकत यह है कि इन प्लेटफॉर्म्स को व्यवहार मनोविज्ञान (behavioral psychology), डेटा विश्लेषण और अटेंशन इंजीनियरिंग (ध्यान खींचने वाली तकनीक) का इस्तेमाल करके खास तौर पर इस तरह बनाया गया है कि कोई भी उनसे पीछा न छुड़ा सके।
पूरी दुनिया में, बच्चे सोशल मीडिया की दुनिया में उन आधिकारिक उम्र की सीमाओं से बहुत पहले ही कदम रख रहे हैं जो इन कंपनियों ने तय की हैं। भले ही न्यूनतम उम्र की शर्त 13 साल है, लेकिन औसतन बच्चे 10 से 11 साल की उम्र में ही अपना पहला सोशल मीडिया अकाउंट बना लेते हैं।
यूनिसेफ (UNICEF) का अनुमान है कि दुनिया भर में इंटरनेट चलाने वाला हर तीसरा व्यक्ति एक बच्चा है।
भारत में, आंकड़ों के मुताबिक 17.5 करोड़ से भी ज़्यादा बच्चे ऑनलाइन सक्रिय हैं। और यह इस्तेमाल थोड़ा-बहुत नहीं है; ओईसीडी (OECD) के अनुसार, अमीर देशों में 95 प्रतिशत से ज़्यादा किशोर रोज़ाना सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं।
बच्चे रोज़ाना औसतन 3 घंटे से ज़्यादा समय सोशल मीडिया पर बिता रहे हैं। भारत के शहरी इलाकों में तो यह आंकड़ा और भी ज़्यादा है, क्योंकि यहाँ इंटरनेट डेटा बहुत सस्ता है और स्मार्टफोन तक सबकी पहुँच आसान है।
इसके नतीजे साफ़ देखे जा सकते हैं:
मानसिक स्वास्थ्य: 2023 के एक शोध (JAMA Pediatrics) के अनुसार, जो किशोर दिन में 3 घंटे से ज़्यादा सोशल मीडिया पर बिताते हैं, उनमें चिंता (Anxiety) और डिप्रेशन का खतरा दोगुना हो जाता है।
WHO की चेतावनी: विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बार-बार कहा है कि स्क्रीन के सामने ज़्यादा समय बिताने से नींद खराब होती है, स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है और एकाग्रता (Attention span) कम हो जाती है।
लड़कियों पर असर: किशोर लड़कियाँ इसकी शिकार ज़्यादा होती हैं, क्योंकि वे अपनी तुलना दूसरों के लुक (दिखावे) से करने लगती हैं और सोशल मीडिया के नियम (Algorithms) भी उन्हें ऐसा ही कंटेंट बार-बार दिखाते हैं।
यह सब कोई इत्तेफाक नहीं है, इसे जानबूझकर इसी तरह बनाया गया है।
ऑस्ट्रेलिया के ई-सेफ्टी कमिश्नर (भारत में ऐसा कोई पद या विभाग नहीं है) ने साफ़ कहा है कि नुकसान की वजह केवल वह 'कंटेंट' नहीं है जो बच्चे देखते हैं, बल्कि इन ऐप्स की बनावट (Structure) ही ऐसी है, जैसे:
इनफिनिट स्क्रॉल (Infinite scroll): वह फीचर जिससे वीडियो या पोस्ट कभी खत्म ही नहीं होते और आप बस अंगूठे से नीचे खिसकाते रहते हैं।
एल्गोरिदम फीड (Algorithmic feeds): आपकी पसंद-नापसंद के हिसाब से आपको उलझाए रखने वाला कंटेंट दिखाना।
लाइक और शेयर का चक्कर: बार-बार 'लाइक' और 'शेयर' चेक करने की आदत डालना।
ये कोई साधारण चीज़ें नहीं हैं, बल्कि ऐसे तरीके हैं जिनसे आपका ज़्यादा से ज़्यादा समय छीना जा सके और आपकी भावनाओं को उत्तेजित किया जा सके।
मेटा, गूगल और टिकटॉक के पूर्व कर्मचारियों ने खुद गवाही दी है कि ये सिस्टम दिमाग के विज्ञान (Neuroscience) और व्यवहार विज्ञान को समझकर ही बनाए गए हैं।
फेसबुक की व्हिसलब्लोअर (भेद खोलने वाली) फ्रांसिस हौगेन ने 2021 में खुलासा किया था कि, इंस्टाग्राम की खुद की रिसर्च में यह सामने आया था कि यह ऐप किशोरियों में अपने शरीर और दिखावे को लेकर हीन भावना पैदा करता है। कंपनी ने सुधार करने के बजाय अपने मुनाफे और बढ़त को चुना।
बच्चों से यह उम्मीद करना कि वे अपनी इच्छाशक्ति (Self-control) से इन सिस्टमों का मुकाबला कर लेंगे, वास्तविकता से परे है।
विज्ञान कहता है कि इंसान के दिमाग का वह हिस्सा (Prefrontal Cortex), जो भावनाओं पर काबू पाने और सही-गलत का फैसला लेने के लिए ज़िम्मेदार होता है, 25 साल की उम्र तक पूरी तरह विकसित नहीं होता।
बच्चों को डिजिटल दुनिया में अकेला छोड़ देना उनका "सशक्तिकरण" नहीं, बल्कि उन्हें उनके हाल पर छोड़ देना (लावारिस छोड़ देना) है।
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दिसंबर 2025 से लागू होने वाले ऑस्ट्रेलिया के नए नियम फेसबुक, इंस्टाग्राम, टिकटॉक, यूट्यूब, स्नैपचैट, X (ट्विटर), रेडिट और ट्विच जैसे बड़े प्लेटफॉर्म्स पर लागू होंगे।
इस कानून की खास बातें:
कंपनियों की ज़िम्मेदारी: प्लेटफॉर्म्स को ऐसे कदम उठाने होंगे जिससे कम उम्र के बच्चों के अकाउंट्स बंद किए जा सकें और नए अकाउंट न बनें।
पेरेंट्स पर कोई जुर्माना नहीं: खास बात यह है कि इसमें बच्चों या माता-पिता को सज़ा नहीं दी जाएगी। सारी जवाबदेही कंपनियों की होगी। नियमों को तोड़ने पर कंपनियों पर लगभग 30 करोड़ रुपये तक का भारी जुर्माना लग सकता है।
केवल 'ईमानदारी' पर भरोसा नहीं: कंपनियाँ अब केवल "क्या आप 13 साल के हैं?" जैसा सवाल पूछकर पल्ला नहीं झाड़ सकतीं। उन्हें आईडी वेरिफिकेशन, चेहरा पहचानने या आवाज़ की तकनीक का इस्तेमाल करना होगा।
क्या खुला रहेगा: यह कानून सभी ऐप्स को बंद नहीं करता। व्हाट्सऐप (मैसेजिंग), गूगल क्लासरूम (पढ़ाई) और यूट्यूब किड्स जैसे ऐप्स को इससे बाहर रखा गया है क्योंकि वे उतने खतरनाक नहीं माने जाते।
सरकार ने यह अधिकार अपने पास रखा है कि जैसे-जैसे ऐप्स बदलेंगे, वह इस लिस्ट में बदलाव कर सकती है।
नियमों को लेकर दुनिया भर में बदलता मिज़ाज ऑस्ट्रेलिया का कदम दुनिया भर में आ रहे बड़े बदलाव को दिखाता है। अब कई देश अपनी नीतियों को नए सिरे से सुधार रहे हैं:
फ्रांस: 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए माता-पिता की अनुमति ज़रूरी है।
जर्मनी: 13 से 16 साल के बच्चों के लिए माता-पिता की मंज़ूरी अनिवार्य है।
स्पेन: अपनी न्यूनतम उम्र सीमा को 14 से बढ़ाकर 16 साल कर रहा है।
डेनमार्क: यहाँ के प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि सोशल मीडिया बच्चों का बचपन चुरा रहा है।
अमेरिका: कई राज्यों में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए माता-पिता की अनुमति अनिवार्य कर दी गई है।
वहाँ के सबसे बड़े डॉक्टर (Surgeon General) ने सोशल मीडिया के असर की तुलना तंबाकू से की है—जैसे 20वीं सदी की शुरुआत में लोग तंबाकू के खतरों को जाने बिना उसका खूब इस्तेमाल करते थे, वैसा ही आज सोशल मीडिया के साथ हो रहा है।
ब्रिटेन (UK) का तरीका: ब्रिटेन ने थोड़ा अलग रास्ता चुना है। उनका कानून उम्र के बजाय 'कंटेंट' (सामग्री) पर नज़र रखता है।
वहाँ कंपनियों को चेहरा स्कैन या आईडी चेक के ज़रिए यह पक्का करना होता है कि बच्चे अश्लील सामग्री, हिंसा या खुद को नुकसान पहुँचाने वाली चीज़ें न देख सकें। हालांकि, अब वहाँ भी 16 साल से कम उम्र वालों पर पूरी तरह पाबंदी लगाने पर विचार चल रहा है।
भारत में नियमों का अभाव (India’s Regulatory Vacuum) भारत की स्थिति चिंताजनक है। यहाँ कोई पाबंदी नहीं है; बल्कि प्रधानमंत्री की ओर से सोशल मीडिया और रील्स (Reels) बनाने को रोज़गार के अवसर के रूप में बढ़ावा दिया जाता है।
भारत में 'कोलिंग्रिज दुविधा' वाली स्थिति अब नहीं रही (यानी अब हम यह नहीं कह सकते कि हमें इसके खतरों का पता नहीं है)। सोशल मीडिया भारत में दो दशकों से है और इसके नुकसान अब किताबी नहीं रह गए हैं।
ये नुकसान स्कूलों, घरों और अस्पतालों में साफ़ दिख रहे हैं।
भारतीय बच्चों में ऑनलाइन धमकियाँ (Cyberbullying), अनजान लोगों द्वारा बहलाया-फुसलाया जाना, हिंसक कंटेंट, कट्टरपंथ और डिजिटल लत के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं।
बच्चों के डॉक्टर और मनोवैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि स्क्रीन का ज़्यादा इस्तेमाल बच्चों में चिंता, नींद की कमी और एकाग्रता की कमी पैदा कर रहा है।
इसके बावजूद, भारत के पास बच्चों को सोशल मीडिया से बचाने के लिए अब तक कोई ठोस कानूनी ढांचा या नियम नहीं हैं।
डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (DPDP) 2023 केवल अप्रत्यक्ष सुरक्षा प्रदान करता है।
इसकी धारा 9 कहती है कि 18 साल से कम उम्र के बच्चों का डेटा इस्तेमाल करने के लिए माता-पिता की स्पष्ट सहमति ज़रूरी है। चूँकि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बहुत सारा पर्सनल डेटा इस्तेमाल करते हैं, इसलिए सिद्धांत रूप में यह नियम बच्चों को बिना माता-पिता की अनुमति के ऐप इस्तेमाल करने से रोकता है।
इस कानून में 'बच्चे' की परिभाषा 18 साल से कम उम्र के व्यक्ति के रूप में दी गई है। लेकिन हकीकत में, यह सुरक्षा सिर्फ कागज़ों तक ही सीमित है क्योंकि:
उम्र की जाँच (Age verification) के लिए कोई अनिवार्य नियम नहीं है।
इसे लागू करने का कोई ठोस तरीका नहीं है।
प्लेटफॉर्म्स (कंपनियों) की इस बात के लिए कोई जवाबदेही नहीं है कि उनके 'एल्गोरिदम' बच्चों को क्या नुकसान पहुँचा रहे हैं।
इसलिए, भारतीय बच्चे आज भी बिना किसी सुरक्षा के इन खतरनाक सिस्टमों के बीच खुले छोड़ दिए गए हैं।
भारत में इस बात के बहुत डरावने उदाहरण मिलते हैं कि कैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म बच्चों की मासूमियत का फायदा उठाते हैं।
BYJU’S का उदाहरण: एक समय में बड़ी एड-टेक कंपनी रही बायजूस ने इंस्टाग्राम रील्स और यूट्यूब शॉट्स के ज़रिए अपनी पढ़ाई का ज़बरदस्त प्रचार किया।
यहाँ 'पढ़ाई' और 'लोगों को उलझाए रखने' (Engagement farming) के बीच का अंतर खत्म हो गया।
बच्चों को बड़े-बड़े सपनों वाले विज्ञापनों में फँसाया गया, जबकि माता-पिता को भावनात्मक रूप से डराकर महंगे कोर्स खरीदने पर मजबूर किया गया। जिसे 'शिक्षा' कहा जा रहा था, वह असल में बच्चों का ध्यान चुराने का एक तरीका बन गया।
इसके अलावा, भारत में बच्चों के बीच ऑनलाइन गेमिंग, खासकर पैसों वाले गेम (Real money gaming) और 'बैटल रॉयल' (जैसे PUBG/BGMI) फॉर्मेट का चलन बहुत बढ़ गया है।
गेमिंग की लत एक और नया संकट बन गई है। भारत सरकार ने यह तो माना है कि ये प्लेटफॉर्म नशीले हैं, लेकिन इन्हें नियंत्रित करने के नियम अब भी बिखरे हुए और कमज़ोर हैं।
बच्चों का रोज़ाना छह से आठ घंटे गेम खेलना, उनकी पढ़ाई का स्तर गिरना और उनका मानसिक तनाव झेलना अब कोई दुर्लभ बात नहीं रह गई है।
इंस्टाग्राम रील्स (Instagram Reels) और छोटे वीडियो वाले प्लेटफॉर्म्स पर भी विशेष ध्यान देने की ज़रूरत है। उनकी बनावट (एल्गोरिदम) ऐसी है जो दिमाग को तुरंत खुशी का एहसास कराती है, हर पल कुछ नया दिखाती है और दूसरों से तुलना करने को मजबूर करती है।
किशोरों के लिए इसका मतलब है—इसे छोड़ न पाना (लत), अपने शरीर और दिखावे को लेकर चिंता, और किसी एक चीज़ पर देर तक ध्यान न लगा पाना। ये नतीजे इत्तेफाक से नहीं निकले हैं, बल्कि भारतीय बच्चों को परोसा गया यह एक तैयार उत्पाद (Product) है।
आखिर देरी क्यों हो रही है? इसका जवाब राजनीति और अर्थव्यवस्था में छिपा है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म भारत के डिजिटल जीवन का हिस्सा बन चुके हैं।
ये राजनीति में भीड़ जुटाने, विज्ञापनों और यहाँ तक कि सरकार की अपनी बात जनता तक पहुँचाने के साधन हैं। इन्हें नियंत्रित करने का मतलब है—ताकतवर कंपनियों और बड़े हितों से सीधी टक्कर लेना।
लेकिन इस देरी की अपनी भारी कीमत है। 2022 में 'लैंसेट कमीशन' (Lancet Commission) ने चेतावनी दी थी कि किशोरों का मानसिक स्वास्थ्य एक वैश्विक संकट बनता जा रहा है, जिसका लंबे समय में आर्थिक नुकसान भी होगा।
पढ़ाई में पिछड़ना, स्वास्थ्य पर बढ़ता खर्च और समाज में घटता भरोसा—ये कोई दूर की बातें नहीं हैं, बल्कि ये आने वाले साफ़ नतीजे हैं।
भले ही अभी इसके पीछे कोई औपचारिक स्टडी या सर्वे रिपोर्ट न हो, लेकिन स्कूल में बच्चों की पढ़ने-लिखने की क्षमता का उनकी क्लास के स्तर से काफी कम होना, सोशल मीडिया से होने वाले भटकाव का नतीजा हो सकता है।
सोशल मीडिया पर लगातार व्यस्त रहना बच्चों का ध्यान पढ़ाई से भटका देता है, जिससे उनकी साक्षरता और बुनियादी कौशल कमज़ोर हो रहे हैं।
सरकार और अधिकारियों द्वारा कार्रवाई में की गई हर साल की देरी इन प्लेटफॉर्म्स की पकड़ को और मज़बूत कर रही है, जिससे 'कोलिंग्रिज दुविधा' (Collingridge Dilemma) और भी गहरी होती जा रही है।
भारत के सामने अब चुनाव 'नई तकनीक' और 'नियमों' के बीच नहीं है, बल्कि 'सुशासन' और 'लापरवाही' के बीच है।
स्पष्ट उम्र सीमा: भारत को केवल 'कंटेंट' पर नज़र रखने के बजाय सोशल मीडिया के लिए उम्र आधारित कड़े नियम बनाने चाहिए।
कंपनियों की जवाबदेही: कंपनियों पर जुर्माना उनके भारत के बिजनेस के बजाय उनकी 'ग्लोबल कमाई' (Global revenue) के आधार पर होना चाहिए, ताकि वे नियमों को हल्के में न लें।
उम्र की सही जाँच: उम्र की पुष्टि करने वाली तकनीकों (Age assurance) को मानक बनाना चाहिए और स्वतंत्र रूप से उनकी जाँच होनी चाहिए।
डिजिटल साक्षरता: डिजिटल साक्षरता को स्कूलों और स्वास्थ्य सेवाओं का हिस्सा बनाना चाहिए। इसे उन कंपनियों के भरोसे नहीं छोड़ना चाहिए जिनका मकसद सिर्फ मुनाफा कमाना है।
नैतिक सच्चाई: हमारी नीतियों को यह मानना होगा कि बचपन कोई बाज़ार नहीं है।
पढ़ते रहें ..... 75% पूरा हुआ
ऑस्ट्रेलिया का फैसला रातों-रात बच्चों का सोशल मीडिया इस्तेमाल खत्म नहीं कर देगा। कोई भी अकेला कानून ऐसा नहीं कर सकता। लेकिन यह प्लेटफॉर्म और यूजर के बीच एक नई सीमा तय करता है, और यही बात मायने रखती है।
यह स्वीकार करता है कि बिना समझ या क्षमता के सोशल मीडिया इस्तेमाल करने की आज़ादी, असल में आज़ादी नहीं है। यह मानता है कि लोकतांत्रिक देशों का कर्तव्य सिर्फ बाज़ार को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि उनकी रक्षा करना भी है जो अपनी रक्षा खुद नहीं कर सकते।
शक्तिशाली तकनीक के प्रति सबसे ज़िम्मेदार रवैया उसे आँख मूँदकर अपनाना या पूरी तरह ठुकराना नहीं है। बल्कि यह साहस दिखाना है कि हम बच्चों से कह सकें— "अभी नहीं।"
और आज के समय में, बचपन को इसी की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।
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