भारत में पुलिस हिरासत में मौतें: न्याय का गिरता स्तर और बढ़ती बेफिक्री
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भारत में पुलिस हिरासत में मौतें: न्याय का गिरता स्तर और बढ़ती बेफिक्री
भारतीय पुलिस व्यवस्था आज स्वीडन (जहाँ मानवाधिकारों और कानून का बहुत सम्मान होता है) और एक 'बनाना रिपब्लिक' (कमज़ोर, अराजक और भ्रष्ट देश) के बीच में खड़ी है। भारतीय पुलिस को खुद अपने भीतर बहुत कुछ सुधारने की ज़रूरत है।
लेख के अनुसार, पुलिस या न्यायिक हिरासत (जेल) में कैदियों की मौत होना अब एक सामान्य बात बन चुकी है। लगातार सामने आने वाले बड़े मामले और हर साल होने वाली मौतों के बड़े आँकड़े यह दिखाते हैं कि यह किसी एक पुलिसवाले की गलती नहीं है, बल्कि पूरी व्यवस्था (System) में एक गहरी बीमारी है।
2. समस्या की जड़ें अंग्रेजों के ज़माने के कानून में हैं:
भारत की पुलिस व्यवस्था का बुनियादी ढांचा अंग्रेजों के समय के '1861 के पुलिस एक्ट' के तहत बना था। उस ज़माने में पुलिस का काम जनता की सेवा करना नहीं, बल्कि जनता को डराना और उन पर काबू पाना था।
आजादी के इतने सालों बाद भी पुलिस का वह डराने-धमकाने और ज़बरदस्ती करने वाला तौर-तरीका आज भी काफी हद तक वैसा ही बना हुआ है।
3. संविधान में अधिकार तो हैं, लेकिन जवाबदेही कमज़ोर है:
यूं तो हमारे संविधान का आर्टिकल 21 (जीवन का अधिकार), अदालतों के कई बड़े फैसले, थानों में सीसीटीवी (CCTV) लगाने के आदेश और पुलिस के खिलाफ शिकायत सुनने वाली अथॉरिटीज मौजूद हैं। लेकिन ज़मीनी हकीकत में इन नियमों का पालन ठीक से नहीं होता।
इसके अलावा, भारत में पुलिसिया प्रताड़ना (Torture) के खिलाफ अलग से कोई सख्त कानून नहीं है, जिसके कारण दोषी पुलिसवालों को सजा मिलना बहुत दुर्लभ होता है।
4. हिंसक तौर-तरीकों को बढ़ावा क्यों मिलता है?
पुलिस हिरासत में हिंसा इसलिए बची हुई है क्योंकि हमारी व्यवस्था और समाज खुद इसे बढ़ावा देते हैं।
केस को जल्दी सुलझाने का भारी दबाव, जाँच के कमज़ोर तरीके, अदालतों की सुस्त रफ्तार और आम जनता में 'तुरंत न्याय' या 'मुठभेड़' (Encounter) को सही मानने की सोच के कारण पुलिस को लगता है कि मारपीट और ज़बरदस्ती करना ही सबसे आसान शॉर्टकट है।
5. समाधान: कानून और सोच दोनों में बदलाव ज़रूरी है:
लेख में कहा गया है कि इस स्थिति को सुधारने के लिए पुलिस पर नजर रखने वाली आज़ाद संस्थाओं को मजबूत करना होगा, संयुक्त राष्ट्र (UN) के प्रताड़ना विरोधी नियमों को मानना होगा और मानवाधिकारों का सम्मान करने वाली पुलिसिंग को बढ़ावा देना होगा।
हमें पुलिसवालों को बल प्रयोग या ताकत दिखाने के लिए इनाम देने के बजाय, कानून के दायरे में रहकर ईमानदारी से काम करने के लिए प्रेरित करना होगा।
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मई 2026
"जब त्रासदी एक सिलसिला बन जाती है"
पुलिस हिरासत में हिंसा अब एक सामान्य बात है
आज हम भारत की एक ऐसी संस्थागत आदत (सरकारी तौर-तरीके) को चुनौती दे रहे हैं, जो हमारे सार्वजनिक जीवन में इतनी गहराई से समा चुकी है कि अक्सर लोग इस पर कोई बड़ा सवाल भी नहीं उठाते।
पुलिस हिरासत में मारपीट (Custodial violence) और कैदियों की मौत होना अब इतनी आम बात मान ली गई है कि बहुत से आम नागरिक इसे पुलिस व्यवस्था का एक दुखद लेकिन न टाला जा सकने वाला हिस्सा मानने लगे हैं।
लेकिन इस बात को चुपचाप स्वीकार कर लेने की हमें बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है। यह हमारे भारतीय गणतंत्र की संवैधानिक नींव को कमज़ोर करता है और कानून के शासन (Rule of law) पर से जनता के भरोसे को पूरी तरह खत्म कर देता है।
इसके सबूतों को झुठलाया नहीं जा सकता (बड़े मामले):
तमिलनाडु का अजीत कुमार मामला: तमिलनाडु के शिवगंगा जिले में, मंदिर के एक 27 साल के सुरक्षा गार्ड अजीत कुमार को चोरी के एक मामले में पुलिस ने पकड़ा।
बाद में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने पाया कि वह मामला पूरी तरह से झूठा और बेबुनियाद था। हिरासत में लिए जाने के मात्र एक दिन के भीतर ही अजीत कुमार की मौत हो गई और उसकी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में उसके शरीर पर करीब 40 चोटों के निशान पाए गए।
जयराज और बेनिक्स मामला (2020): इसी तरह साल 2020 में, कोविड-19 महामारी के लॉकडाउन के दौरान एक छोटी सी दुकान खोलने के नियम का उल्लंघन करने पर पुलिस पी. जयराज और उनके बेटे बेनिक्स को पकड़कर ले गई।
कथित तौर पर पुलिस हिरासत में दी गई क्रूर यातनाओं के कारण उन दोनों की मौत हो गई। इस घटना की बर्बरता ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था, और आखिरकार एक दुर्लभ फैसले में अदालत ने दोषी 9 पुलिसवालों को फांसी की सजा सुनाई।
ऊपरी तौर पर देखने पर ये घटनाएँ अलग-अलग लग सकती हैं। लेकिन अगर हम इन्हें एक साथ जोड़कर देखें, तो एक बहुत ही परेशान करने वाला तरीका (Pattern) सामने आता है।
घटना की बारीकियाँ अलग हो सकती हैं, लेकिन अंदर की हकीकत एक ही है—डराना-धमकाना और हिंसा करना आज भी पुलिस के कामकाज का एक रोज़मर्रा का हिस्सा बना हुआ है।
मौतों के डराने वाले आँकड़े:
सरकारी और सामाजिक संस्थाओं के रिकॉर्ड इस कड़वे सच को और मजबूती से सामने लाते हैं:
2019: सामाजिक संस्थाओं के अनुमान के अनुसार साल 2019 में पुलिस हिरासत में 1,731 मौतें दर्ज की गईं, जिसका मतलब है कि देश में हर दिन लगभग 5 कैदियों की मौत हुई।
2022: इसके बाद साल 2022 में न्यायिक हिरासत (जेल) में 1,995 कैदियों की मौत हुई, जिनमें से 159 मौतों को 'अप्राकृतिक' (जैसे आत्महत्या या हिंसा के कारण) माना गया।
2023 और 2024: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के आँकड़ों के अनुसार साल 2023 में हिरासत में मौतों की संख्या लगभग 2,400 थी, जो साल 2024 में और बढ़कर 2,739 तक पहुँच गई।
2025 से मार्च 2026: साल 2025 से लेकर मार्च 2026 के मध्य तक ही सरकारी तौर पर 170 और मौतें दर्ज की जा चुकी हैं।
ये आँकड़े सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं हैं कि ये संख्या में बहुत बड़े हैं, बल्कि इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये लगातार हो रहे हैं।
अगर किसी एक साल मौतों का आँकड़ा अचानक बढ़ता, तो हम उसे एक अपवाद (गलती) मानकर छोड़ सकते थे। लेकिन सालों से लगातार बना हुआ यह डरावना सिलसिला किसी एक गलती का नतीजा नहीं हो सकता।
कुछ राज्यों में सबसे ज़्यादा मामले:
इससे भी बड़ी बात यह है कि ये मौतें पूरे देश में बराबर या अचानक नहीं होतीं। बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे कुछ राज्य ऐसे हैं, जहाँ पुलिस हिरासत में कैदियों की मौत के सबसे ज़्यादा मामले बार-बार दर्ज किए जाते हैं।
कमज़ोर वर्गों पर सबसे ज़्यादा मार
इसके साथ ही, एक कड़वा सच यह भी है कि पुलिस हिरासत में हिंसा के शिकार होने वाले ज़्यादातर लोग समाज के सबसे कमज़ोर और पिछड़े वर्गों से आते हैं—जैसे दलित, आदिवासी, मुस्लिम और प्रवासी मजदूर (Migrant labourers जो रोजी-रोटी के लिए अपना घर छोड़कर दूसरे राज्यों में काम करते हैं)।
नतीजतन, पुलिस हिरासत में होने वाली यह हिंसा कानून को बराबर रूप से लागू करने के बजाय, भारत के समाज में पहले से मौजूद ऊंच-नीच के भेदभाव (Social hierarchies) को ही दिखाती है।
सरकार की यह डराने-धमकाने और दबाने वाली ताकत (Coercive power) सबसे ज़्यादा उन गरीब और लाचार लोगों पर बरसती है, जिनके पास इसके खिलाफ लड़ने की न तो ताकत होती है और न ही पैसा।
एक बड़ा सवाल
इस पूरी पृष्ठभूमि (Backdrop) को देखने के बाद, हमारे सामने एक बहुत बड़ा और बुनियादी सवाल खड़ा होता है:
"जब हमारे देश में इतने सारे संवैधानिक अधिकार मौजूद हैं, अदालतों ने इतने कड़े नियम बनाए हैं और समय-समय पर जनता का गुस्सा भी फूटता है—फिर भी पुलिस कस्टडी में होने वाली यह हिंसा रुक क्यों नहीं रही है?"
इसका सीधा और साफ जवाब यह है कि यह समस्या केवल किसी एक या दो बुरे पुलिसवालों की व्यक्तिगत गलती (Individual misconduct) नहीं है, बल्कि यह हमारी पूरी पुलिस व्यवस्था के बुनियादी ढांचे और बनावट (Institutional design) में ही छिपी हुई एक बड़ी बीमारी है।
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अंग्रेजों के ज़माने की सोच (1861 का कानून) पुलिस हिरासत में होने वाली हिंसा को समझने के लिए, सबसे पहले हमें भारतीय पुलिस की शुरुआत और उसके इतिहास को समझना होगा।
आज की हमारी आधुनिक पुलिस व्यवस्था का ढांचा साल 1861 के पुलिस एक्ट द्वारा तैयार किया गया था, जिसे अंग्रेजों ने 1857 की क्रांति (स्वतंत्रता संग्राम) के तुरंत बाद बनाया था। उस समय अंग्रेजों का मकसद जनता की सेवा करना नहीं था, बल्कि भारत पर अपना राज (साम्राज्य) मजबूत बनाए रखना था।
ब्रिटिश सरकार को एक ऐसी पुलिस फोर्स चाहिए थी जो आम जनता को डराकर अपने काबू में रख सके, विरोध की आवाज़ों को कुचल सके और लोगों को गुलामी मानने पर मजबूर कर सके। यही कारण है कि पुलिस को नागरिकों के रक्षक के रूप में नहीं, बल्कि सरकार के एक हंटर (ताकत) के रूप में तैयार किया गया था।
आज़ादी के बाद भी नहीं बदला ढांचा साल 1947 में जब हमारा देश आज़ाद हुआ, तो भारत की राजनैतिक व्यवस्था तो पूरी तरह बदल गई। लेकिन, अफ़सोस की बात यह है कि पुलिस के काम करने के बुनियादी तरीके और उसके ढांचे (Architecture) में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया।
पुलिस की वर्दी बदल गई, देश की सरकार बदल गई और हमारा अपना संविधान भी आ गया। लेकिन, पुलिस का पुराना आदेश देने का तरीका, थानों की अंदरूनी संस्कृति और जनता पर बल प्रयोग करने की उनकी पुरानी आदतें आज भी काफी हद तक वैसी ही बनी हुई हैं।
कानून की कोशिशें बनाम अधूरी हकीकत यह सच है कि आज़ाद भारत ने इस पुरानी पुलिस व्यवस्था को सुधारने और नागरिकों को सुरक्षा देने के लिए संविधान में कई नियम बनाए। हमारे संविधान का आर्टिकल 21 हर नागरिक को जीने का और व्यक्तिगत आज़ादी का अधिकार देता है।
समय-समय पर अदालतों ने भी कई बड़े फैसले दिए—जैसे 'डी.के. बासु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य' का ऐतिहासिक मामला हो या साल 2020 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा थानों में अनिवार्य सीसीटीवी (CCTV) लगाने का आदेश हो। इन सबका मकसद पुलिस के गलत तौर-तरीकों पर लगाम लगाना था।
लेकिन ज़मीनी हकीकत में इन नियमों का पालन आज भी बहुत कमज़ोर है:
देश के हज़ारों पुलिस थानों में आज भी ठीक से नजर रखने वाले कैमरे (CCTV) नहीं लगे हैं।
जहाँ कैमरे लगे भी हैं, वहाँ या तो वे थानों के सभी कोनों को कवर नहीं करते या फिर उनकी रिकॉर्डिंग को संभालकर रखने का सिस्टम (डिजिटल स्टोरेज) खराब रहता है।
इसी तरह, सुप्रीम कोर्ट ने साल 2006 में आदेश दिया था कि हर राज्य में पुलिस के खिलाफ शिकायतों की जाँच करने के लिए एक आज़ाद संस्था (Police Complaints Authority) बनाई जाए, लेकिन कई राज्यों ने आज तक इसे पूरी तरह लागू नहीं किया है।
नतीजा यह है कि पुलिस की जवाबदेही केवल कागज़ों और किताबों में ही दिखाई देती है, असली ज़िंदगी में नहीं।
टॉर्चर (प्रताड़ना) के खिलाफ सख्त कानून का न होना इस समस्या के बढ़ने के पीछे एक और बहुत बड़ी कानूनी कमी है। भारत के पास आज भी पुलिसिया प्रताड़ना या टॉर्चर को एक अलग और गंभीर अपराध मानने वाला कोई सीधा और पक्का कानून नहीं है।
जब पुलिस हिरासत में किसी के साथ मारपीट होती है, तो उसके खिलाफ सीधे 'टॉर्चर' का केस दर्ज नहीं होता। बल्कि उसे सामान्य मारपीट, गैर-इरादतन हत्या या ड्यूटी के दौरान गड़बड़ी जैसी आम धाराओं में डाल दिया जाता है।
कानून की इस उलझन के कारण दोषी पुलिसवालों के मन से कानून का डर खत्म हो जाता है और उन पर मुकदमा चलाकर सज़ा दिलाना बहुत मुश्किल हो जाता है।
इसके साथ ही, हमारे देश में गवाहों को सुरक्षा देने का सिस्टम (Witness protection) बहुत ही कमज़ोर और नाज़ुक है।
हिरासत में हुई हिंसा के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले पीड़ितों के परिवारों को अक्सर डराया-धमकाया जाता है, कानूनी कार्यवाहियों में सालों की देरी का सामना करना पड़ता है और भारी आर्थिक तंगी से गुज़रना पड़ता है।
इसलिए, इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि दोषी पुलिसवालों को अदालत से सज़ा मिलने की दर (Conviction rate) बहुत ही कम है।
इसका नतीजा यह हुआ है कि हमारे समाज में एक ऐसी संस्कृति बन गई है जहाँ पुलिसवालों के मन में कानून का कोई डर नहीं रह गया है (Culture of impunity)। यहाँ दोषियों को सज़ा मिलना एक अपवाद (दुर्लभ बात) बन गया है, कोई आम नियम नहीं।
भारत की अंतर्राष्ट्रीय छवि पर दाग
हैरानी की बात नहीं है कि हमारे संविधान के बड़े-बड़े आदर्शों और ज़मीनी हकीकत के बीच बढ़ते इस बड़े अंतर ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है।
'ग्लोबल टॉर्चर इंडेक्स' (Global Torture Index - वैश्विक प्रताड़ना सूचकांक) अब भारत को उन देशों की श्रेणी में रखता है जहाँ कैदियों को प्रताड़ित करने और उनके साथ बुरा बर्ताव करने का सबसे ज़्यादा खतरा (High-risk) होता है।
इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र (United Nations) के विशेष दूतों ने इसके खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय कानून के एक बेहद महत्वपूर्ण सिद्धांत 'जूस कोजेंस' (Jus cogens) का हवाला दिया है। यह सिद्धांत मानता है कि किसी भी इंसान को टॉर्चर न करना अंतर्राष्ट्रीय कानून का एक ऐसा अटूट नियम है जिसे दुनिया का हर देश मानने के लिए बाध्य है।
यह लैटिन भाषा का एक शब्द है जिसका अर्थ होता है "बाध्यकारी या सर्वोपरि कानून"। यह अंतर्राष्ट्रीय कानून का एक ऐसा बुनियादी और सार्वभौमिक (Universal) सिद्धांत है जिसे दुनिया के सभी देश मानने के लिए मजबूर हैं, चाहे उन्होंने इसके लिए अपनी लिखित सहमति दी हो या न दी हो।
यह नियम अंतर्राष्ट्रीय कानूनों में सबसे ऊपर बैठता है। इसका सीधा मतलब यह है कि दुनिया की कोई भी सरकार, कोई भी संधि या कोई भी पुराना रिवाज इस नियम को तोड़ नहीं सकता। इसके तहत किसी भी इंसान को प्रताड़ित करना (टॉर्चर करना) पूरी तरह प्रतिबंधित है।
इतने बड़े वैश्विक नियमों के बावजूद, भारत ने अभी तक संयुक्त राष्ट्र के 'प्रताड़ना विरोधी समझौते' (Convention Against Torture) को पूरी तरह से स्वीकार (Ratify) नहीं किया है।
नतीजतन, एक तरफ तो भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बनने की इच्छा (Democratic aspirations) रखता है, लेकिन दूसरी तरफ उसकी पुलिस के काम करने के हिंसक तरीके इसके बिल्कुल उलट दिखाई देते हैं।
अब इन दोनों के बीच के इस बड़े अंतर को नज़रअंदाज़ करना दिन-ब-दिन बहुत मुश्किल होता जा रहा है।
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केवल सरकारी कमियाँ ही ज़िम्मेदार नहीं हैं
लेकिन, इस समस्या को सिर्फ पुलिस या कानून की कमज़ोरियों के भरोसे पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। सबसे बड़ा और गहरा सवाल तो यह है कि बार-बार ऐसी खौफनाक घटनाएँ सामने आने के बाद भी हमारा समाज (Socially) इस पुलिसिया हिंसा को चुपचाप बर्दाश्त क्यों कर लेता है?
इस बात को समझने के लिए महान दार्शनिक थॉमस हॉब्स (Thomas Hobbes) का एक सिद्धांत हमारी मदद कर सकता है। हॉब्स ने समझाया था कि इंसान अपनी सुरक्षा के बदले में अपनी कुछ आज़ादियाँ सरकार (State) को सौंप देता है।
इसलिए, किसी भी सरकार की असली ताकत और उसकी मान्यता इसी बात पर टिकी होती है कि वह जनता की जान की रक्षा करे और देश में कानून-व्यवस्था बनाए रखे।
लेकिन हॉब्स ने यह भी माना था कि सरकार की इस ताकत की भी एक सीमा होनी चाहिए। अगर सरकार खुद ही बिना किसी वजह के आम जनता पर हिंसा और अत्याचार करने लगे, तो जनता और सरकार के बीच का यह भरोसा (Social contract या सामाजिक समझौता) टूटने लगता है।
इस नज़रिए से देखने पर पता चलता है कि पुलिस हिरासत में होने वाली मौतें यह नहीं दिखातीं कि सरकार कमज़ोर है, बल्कि यह दिखाती हैं कि सरकार के पास ज़रूरत से ज़्यादा ताकत (Excess power) आ गई है।
यहाँ समस्या पुलिस का कमज़ोर होना नहीं है, बल्कि समस्या यह है कि पुलिस की ताकत पर कोई रोक-टोक या लगाम नहीं है।
काम का दबाव और टॉर्चर का शॉर्टकट
भारतीय पुलिस के काम करने का तरीका इस हिंसक प्रवृत्ति को और बढ़ावा देता है। हमारे देश में पुलिसवालों पर केस को जल्दी से जल्दी सुलझाने का भारी दबाव होता है, जबकि हकीकत यह है कि थानों में पुलिसवालों
की भारी कमी है, जाँच-पड़ताल का कोई आधुनिक सिस्टम नहीं है और हमारी अदालतें पहले से ही करोड़ों मुकदमों के बोझ से दबी हुई हैं।
नतीजतन, पुलिस के लिए किसी भी आरोपी को टॉर्चर करना (मारना-पीटना) सबसे आसान शॉर्टकट बन जाता है। मारपीट करने से आरोपी जल्दी जुर्म कबूल कर लेता है, केस फटाफट बंद हो जाता है और बाहर से देखने पर ऐसा लगता है कि पुलिस बहुत मुस्तैदी और समझदारी से काम कर रही है।
'एनकाउंटर' और समाज की सोच
इसी तरह, जिन्हें हम 'एनकाउंटर' कहते हैं (जो असल में कानून की भाषा में अदालत से बाहर जाकर की गई गैर-कानूनी हत्याएँ हैं), वे अदालतों के लंबे और सुस्त चक्करों को पूरी तरह दरकिनार कर देते हैं।
दुख की बात तो यह है कि हमारे देश के कई राज्यों में 'एनकाउंटर' करने वाले पुलिस अफसरों को आम जनता से खूब तारीफें मिलती हैं, मीडिया में उन्हें 'हीरो' की तरह दिखाया जाता है और सरकारें भी उन्हें तरक्की (Promotion) और मेडल देती हैं।
इसका नतीजा यह होता है कि पुलिसवालों को कानून के सही नियमों का पालन करने के लिए कोई इनाम नहीं मिलता, बल्कि उन्हें कानून तोड़कर 'तुरंत नतीजा' दिखाने के लिए उकसाया जाता है।
यह खतरनाक सोच अब सिर्फ पुलिस थानों तक ही सीमित नहीं रह गई है, बल्कि पूरे समाज में फैल चुकी है।
आम नागरिकों और मज़दूरों पर पुलिसिया अत्याचार
कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान दिल्ली, नोएडा और देश के कई अन्य शहरों से ऐसी ढेरों खबरें और रिपोर्ट सामने आई थीं, जिनमें सब्ज़ी बेचने वालों, डिलीवरी करने वाले कर्मचारियों और आम नागरिकों के साथ पुलिस द्वारा की गई मारपीट का पूरा ब्यौरा (Documentation) था।
उस समय ऐसे कई वीडियो वायरल हुए थे जिनमें पुलिस लोगों को सड़कों पर ज़बरदस्ती घुटनों के बल रेंगने (Crawling) पर मजबूर कर रही थी, उन्हें सरेआम बेइज़्ज़त कर रही थी और उनके साथ लाठियों से मारपीट कर रही थी।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये लोग कोई खूंखार अपराधी (Hardened criminals) नहीं थे। इनमें से ज़्यादातर लोग तो लॉकडाउन के कठिन समय में भी हमारे घरों तक राशन और सब्ज़ी जैसी ज़रूरी सेवाएँ (Essential services) पहुँचा रहे थे।
आज़ाद भारत में गुलामी की परछाई
इसके बावजूद, पुलिस और प्रशासन का इस हिंसा के पीछे वही पुराना तर्क (Justification) था: नियमों का पालन कराने के लिए अनुशासन ज़रूरी है, और अनुशासन बनाए रखने के लिए डराना-धमकाना या बल प्रयोग करना ही पड़ेगा।
इस पूरे रवैये से जो संदेश मिला, वह बिल्कुल साफ था—आज भी आम नागरिकों को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में नहीं देखा जाता जिसके पास अपने कुछ पक्के अधिकार (Rights) हैं, बल्कि उन्हें राजा की 'प्रजा' (Subjects) माना जाता है जिनका इकलौता काम सिर्फ सरकार और अधिकारियों के हुक्म का पालन करना है।
इस मायने में, हम कह सकते हैं कि अंग्रेजों के ज़माने की पुलिस व्यवस्था और उनकी गुलामी वाली सोच की परछाई (Shadow of colonial policing) आज के आज़ाद भारत में भी पूरी तरह मंडरा रही है।
स्वीडन और जर्मनी का आदर्श उदाहरण
दुनिया के अन्य देशों से तुलना करने पर यह हकीकत बिल्कुल साफ हो जाती है।
स्वीडन (Sweden) का हाल:
स्वीडन में पुलिस कस्टडी (हिरासत) में मौत होना बेहद दुर्लभ (Rare) बात है। अगर कभी ऐसा होता भी है, तो वह आमतौर पर किसी बीमारी (Medical emergency) या आत्महत्या के कारण होता है, और ऐसी घटना होते ही तुरंत एक आज़ाद संस्था द्वारा इसकी जाँच शुरू कर दी जाती है।
वहाँ पुलिस की ट्रेनिंग में इस बात पर सबसे ज़्यादा ज़ोर दिया जाता है कि बिना लड़ाई-झगड़े के मामले को कैसे शांत किया जाए (De-escalation), बातचीत कैसे की जाए और ज़रूरत पड़ने पर कानून के दायरे में रहकर कितनी कम से कम ताकत का इस्तेमाल किया जाए।
यही कारण है कि वहाँ की जनता का अपनी पुलिस पर भरोसा दुनिया में सबसे ज़्यादा है।
जर्मनी (Germany) का हाल:
जर्मनी का ढांचा भले ही स्वीडन से बड़ा और पेचीदा है, लेकिन वहाँ भी हिरासत में मौतें न के बराबर होती हैं और हर मामले की बहुत कड़ाई से जाँच की जाती है। वहाँ पूछताछ के दौरान किसी भी आरोपी को मारना-पीटना या डराना (Coercive interrogation) कानूनन पूरी तरह प्रतिबंधित है।
पुलिस द्वारा ताकत के इस्तेमाल पर बहुत कड़े नियम हैं और अगर कोई पुलिसवाला कानून तोड़ता है, तो उसे अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ता है। इसलिए, वहाँ पुलिस की जवाबदेही (Accountability) किसी एक घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी व्यवस्था का हिस्सा है।
एक महत्वपूर्ण बात:
इन देशों में पुलिस का अच्छा होना सिर्फ इसलिए नहीं है कि वे अमीर देश हैं। यह वहाँ की संस्थाओं की बनावट और उनकी कानून मानने की संस्कृति के कारण है। इन दोनों देशों में 'कानून की सही प्रक्रिया' (Legality) को सबसे ऊपर रखा जाता है, न कि अपने फायदे या शॉर्टकट को।
दूसरी तरफ की कड़वी हकीकत
इस सोच के बिल्कुल दूसरे छोर पर वे देश आते हैं जिन्हें आम भाषा में 'बनाना रिपब्लिक' कहा जाता है। ये ऐसे कमज़ोर देश होते हैं जहाँ सरकारी संस्थाएँ पूरी तरह खोखली होती हैं, कानून का पालन केवल चुनिंदा लोगों (गरीबों और विरोधियों) पर ही किया जाता है और ताकतवर लोग अपनी मनमर्जी से पुलिस और सेना का इस्तेमाल करते हैं।
ऐसी व्यवस्थाओं में पुलिस की हिंसा कोई इकलौती या अचानक हुई गलती नहीं होती। बल्कि, वहाँ हिंसा ही सरकार चलाने का मुख्य ज़रिया बन जाती है। फर्जी एनकाउंटर और गैर-कानूनी हत्याओं को 'काम को जल्दी निपटाने', 'शांति व्यवस्था बनाए रखने' या 'देश की सुरक्षा' के नाम पर सही ठहराया जाता है।
नतीजा यह होता है कि पुलिस पर से जनता का भरोसा पूरी तरह उठ जाता है और कानून का राज केवल नाम का रह जाता है।
हमारा देश भारत इन दोनों में से किसी भी एक श्रेणी में पूरी तरह फिट नहीं बैठता।
एक तरफ (सकारात्मक पहलू): भारत के पास एक पूरी तरह स्वतंत्र और ताकतवर अदालत (Judiciary) है, एक बहुत ही मजबूत और महान संविधान है और एक जागरूक समाज व मीडिया (Civil society) है जो गलत के खिलाफ आवाज़ उठाता है।
दूसरी तरफ (चिंताजनक पहलू): हमारे यहाँ लगातार होने वाली पुलिस कस्टडी की हिंसा और मौतें उन लक्षणों को दिखाती हैं जो आमतौर पर किसी कमज़ोर और पिछड़े देश (जैसे बनाना रिपब्लिक) की व्यवस्था में पाए जाते हैं।
इसीलिए कहा गया है कि भारतीय पुलिस व्यवस्था आज स्वीडन और बनाना रिपब्लिक के बिल्कुल बीच में आकर खड़ी हो गई है।
इसका नतीजा यह हुआ है कि आज हमारे यहाँ एक बहुत ही परेशान करने वाली दोहरी (Hybrid) स्थिति बन गई है—हमारा देश बनावट और कागज़ों में तो पूरी तरह लोकतांत्रिक (Democratic) है, लेकिन असल कामकाज और व्यवहार में यह अक्सर दमनकारी और हिंसक (Coercive) दिखाई देता है।
इसके बुरे नतीजे सिर्फ उन पीड़ितों तक सीमित नहीं रहते जो हिंसा का शिकार होते हैं, बल्कि यह हमारी पूरी न्याय व्यवस्था की साख और मान्यता को ही खत्म कर देता है। जब पुलिस मार-पीटकर ज़बरदस्ती जुर्म कबूल (Confessions) करवाती है, तो पूरी जाँच-पड़ताल ही कमज़ोर हो जाती है।
इसके कारण बेकसूर लोग सजा भुगतते हैं और असली अपराधी कानून की आँखों में धूल झोंककर साफ़ बच निकलते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि इससे पुलिस पर से जनता का भरोसा धीरे-धीरे पूरी तरह उठ जाता है।
समाज के पिछड़े और कमज़ोर वर्गों पर इसका सबसे बुरा असर पड़ता है, जिससे वे देश की व्यवस्था से खुद को और ज़्यादा अलग-थलग महसूस करने लगते हैं।
इस समस्या को सुधारने के रास्ते कोई अनजान नहीं हैं, सब जानते हैं कि क्या करना है। सबसे पहले, भारत को सभी राज्यों में 'पुलिस शिकायत प्राधिकरण' (Police Complaints Authority - PCA) के नेटवर्क को
मजबूत करना होगा, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने साल 2006 में बनाने का आदेश दिया था। आज के समय में यह संस्था एक 'लंगड़ी बत्तख' (Lame duck - यानी बिना किसी असली ताकत वाली संस्था) बनकर रह गई है।
इसके अलावा, भारत को संयुक्त राष्ट्र के 'प्रताड़ना विरोधी समझौते' (UN Convention Against Torture) को मंज़ूरी देनी होगी ताकि एक मजबूत कानून बन सके।
पूछताछ के लिए 'मेंडेज़ सिद्धांतों' (Méndez Principles) को लागू करना होगा, जो मारपीट के बजाय पक्के सबूतों और वैज्ञानिक तरीकों से पूछताछ करने पर ज़ोर देते हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) को और ज़्यादा ताकतवर बनाना होगा ताकि पुलिस पर कड़ी और निष्पक्ष नज़र रखी जा सके।
सोच और इनाम के तरीके में बदलाव:
सिर्फ नए कानून बना देने से यह बीमारी दूर नहीं होगी। इसके लिए पुलिस को मिलने वाले इनामों और तरक्की के नियमों को बदलना होगा:
पुलिसवालों का प्रमोशन (तरक्की) इस आधार पर होना चाहिए कि उन्होंने कानून के दायरे में रहकर कितनी ईमानदारी से काम किया, न कि इस आधार पर कि उन्होंने मार-पीटकर कितनी जल्दी केस बंद कर दिया।
पुलिस की ट्रेनिंग में मानवाधिकारों का सम्मान करने वाली पुलिसिंग (Rights-based policing) सिखाना अनिवार्य होना चाहिए।
हमारी अदालतों के काम करने की रफ्तार को तेज़ और आसान बनाना होगा।
गरीब और कमज़ोर नागरिकों को बचाने के लिए मुफ्त कानूनी सहायता (Legal aid) के सिस्टम को मजबूत करना होगा।
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समाज की सोच बदलना ज़रूरी है
आखिरकार, यह लड़ाई जितनी सरकारी व्यवस्था को सुधारने की है, उतनी ही हमारे समाज की सोच को बदलने की भी है। दशकों से हमारे समाज के एक बड़े हिस्से ने इस गलत सोच को अपना लिया है कि न्याय पाने के लिए पुलिस का मार-पीट करना बिल्कुल सही है।
लेकिन हमें यह समझना होगा कि एक अच्छी पुलिस व्यवस्था इस बात से नहीं नापी जाती कि जनता उसके नाम से कितना डरती है, बल्कि इस बात से नापी जाती है कि जनता उस पर कितना भरोसा करती है।
यह पूरी चर्चा हमें वापस आकाश डेलिसन की याद दिलाती है।
इसी साल 8 मार्च (2026) को तमिलनाडु के एक अस्पताल में इस 26 साल के नौजवान की मौत हो गई, और आरोप है कि उसकी मौत पुलिस हिरासत में लगी गंभीर चोटों के कारण हुई थी। जब तक हम व्यवस्था को नहीं बदलेंगे, तब तक ऐसे बेकसूर युवा दम तोड़ते रहेंगे।
आकाश डेलिसन की कहानी और परिवार का संघर्ष
मानमदुरै के कृष्णराजापुरम इलाके के रहने वाले आकाश डेलिसन (जो कि अनुसूचित जाति - Scheduled Caste से ताल्लुक रखते थे) और एक अन्य व्यक्ति गुणा को पुलिस ने 5 मार्च की रात को दो मजदूरों पर कुल्हाड़ी से हमला करने के आरोप में गिरफ्तार किया था।
हिरासत में हुई मारपीट के कारण जब अस्पताल में आकाश की मौत हो गई, तो उसके महीनों बाद भी उनके परिवार ने उनका अंतिम संस्कार करने से साफ मना कर दिया।
परिवार की शर्त थी कि जब तक दोषी पुलिसवालों की जवाबदेही तय नहीं होती और न्याय नहीं मिलता, वे अंतिम संस्कार नहीं करेंगे। ऐसा करके उन्होंने अपने निजी दुख को सरकार के सामने एक नैतिक चुनौती बनाकर खड़ा कर दिया।
परिवार का यह कदम हमारी व्यवस्था से दो बड़े सवाल पूछता है:
पहला सवाल: क्या काम को जल्दी निपटाने के नाम पर, हमारी लंबी अदालती प्रक्रिया को छोड़कर 'तुरंत न्याय' (Instant justice/एनकाउंटर या मारपीट) करना सही है ?
दूसरा सवाल: क्या आज के भारत में सरकार और पुलिस की ताकत कानून के दायरे में बंधी हुई है, या फिर वह धीरे-धीरे कानून के बंधनों से आज़ाद (मनमर्जी करने के लिए स्वतंत्र) होती जा रही है?
इन सवालों के जवाब से ही न केवल उन लोगों की किस्मत तय होगी जो भविष्य में कभी पुलिस हिरासत में जाएंगे, बल्कि इससे हमारे पूरे भारतीय गणतंत्र (Republic) का चरित्र और साख भी तय होगी।
इतिहास और दुनिया का कड़वा सबक
कोई भी सरकार या देश जो अपनी हिरासत में लिए गए कैदियों की गरिमा (Dignity/इंसानी सम्मान) की रक्षा नहीं कर सकता, वह खुद अपनी ही ताकत और साख को धीरे-धीरे खत्म कर देता है।
दुनिया के विकसित और समझदार लोकतंत्रों (जैसे स्वीडन या जर्मनी) से हमें यह सबक मिलता है कि वहाँ भी गलतियाँ या अत्याचार पूरी तरह असंभव नहीं हैं, लेकिन वहाँ की संस्थाएँ और कानून पुलिस को ऐसा करने से मजबूती से रोकते हैं।
इसके विपरीत, कमज़ोर देशों (बनाना रिपब्लिक) से हमें यह सबक मिलता है कि एक बार अगर पुलिसिया हिंसा और ज़बरदस्ती करना समाज में सामान्य बात बन जाए, तो फिर उस व्यवस्था को दोबारा सुधारना और पलटना बेहद मुश्किल हो जाता है।
"यह चुनाव केवल किताबों में लिखी कोई थ्योरी (सिद्धांत) नहीं है और न ही यह हमसे कहीं दूर है।
यह विकल्प हमारे देश के शवगृहों (Morgues), अदालतों और पुलिस थानों में बार-बार कड़वे सच के रूप में लिखा जा रहा है, और यह विकल्प हमें उन दुखी परिवारों के शांत लेकिन दृढ़ विरोध (Quiet refusal) में साफ़ दिखाई देता है, जो अपनों को खोने के बाद भी हिम्मत नहीं हार रहे हैं और अंतिम संस्कार करने से पहले इंसाफ की मांग पर अड़े हुए हैं।"
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