पुलिस हिरासत में होने वाली हिंसा को समाज क्यों स्वीकार कर लेता है ?
केवल सरकारी कमियाँ ही ज़िम्मेदार नहीं हैं
लेकिन, इस समस्या को सिर्फ पुलिस या कानून की कमज़ोरियों के भरोसे पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। सबसे बड़ा और गहरा सवाल तो यह है कि बार-बार ऐसी खौफनाक घटनाएँ सामने आने के बाद भी हमारा समाज (Socially) इस पुलिसिया हिंसा को चुपचाप बर्दाश्त क्यों कर लेता है?
इस बात को समझने के लिए महान दार्शनिक थॉमस हॉब्स (Thomas Hobbes) का एक सिद्धांत हमारी मदद कर सकता है। हॉब्स ने समझाया था कि इंसान अपनी सुरक्षा के बदले में अपनी कुछ आज़ादियाँ सरकार (State) को सौंप देता है।
इसलिए, किसी भी सरकार की असली ताकत और उसकी मान्यता इसी बात पर टिकी होती है कि वह जनता की जान की रक्षा करे और देश में कानून-व्यवस्था बनाए रखे।
लेकिन हॉब्स ने यह भी माना था कि सरकार की इस ताकत की भी एक सीमा होनी चाहिए। अगर सरकार खुद ही बिना किसी वजह के आम जनता पर हिंसा और अत्याचार करने लगे, तो जनता और सरकार के बीच का यह भरोसा (Social contract या सामाजिक समझौता) टूटने लगता है।
इस नज़रिए से देखने पर पता चलता है कि पुलिस हिरासत में होने वाली मौतें यह नहीं दिखातीं कि सरकार कमज़ोर है, बल्कि यह दिखाती हैं कि सरकार के पास ज़रूरत से ज़्यादा ताकत (Excess power) आ गई है।
यहाँ समस्या पुलिस का कमज़ोर होना नहीं है, बल्कि समस्या यह है कि पुलिस की ताकत पर कोई रोक-टोक या लगाम नहीं है।
शॉर्टकट का चक्कर और 'एनकाउंटर' की हकीकत
काम का दबाव और टॉर्चर का शॉर्टकट
भारतीय पुलिस के काम करने का तरीका इस हिंसक प्रवृत्ति को और बढ़ावा देता है। हमारे देश में पुलिसवालों पर केस को जल्दी से जल्दी सुलझाने का भारी दबाव होता है, जबकि हकीकत यह है कि थानों में पुलिसवालों
की भारी कमी है, जाँच-पड़ताल का कोई आधुनिक सिस्टम नहीं है और हमारी अदालतें पहले से ही करोड़ों मुकदमों के बोझ से दबी हुई हैं।
नतीजतन, पुलिस के लिए किसी भी आरोपी को टॉर्चर करना (मारना-पीटना) सबसे आसान शॉर्टकट बन जाता है। मारपीट करने से आरोपी जल्दी जुर्म कबूल कर लेता है, केस फटाफट बंद हो जाता है और बाहर से देखने पर ऐसा लगता है कि पुलिस बहुत मुस्तैदी और समझदारी से काम कर रही है।
'एनकाउंटर' और समाज की सोच
इसी तरह, जिन्हें हम 'एनकाउंटर' कहते हैं (जो असल में कानून की भाषा में अदालत से बाहर जाकर की गई गैर-कानूनी हत्याएँ हैं), वे अदालतों के लंबे और सुस्त चक्करों को पूरी तरह दरकिनार कर देते हैं।
दुख की बात तो यह है कि हमारे देश के कई राज्यों में 'एनकाउंटर' करने वाले पुलिस अफसरों को आम जनता से खूब तारीफें मिलती हैं, मीडिया में उन्हें 'हीरो' की तरह दिखाया जाता है और सरकारें भी उन्हें तरक्की (Promotion) और मेडल देती हैं।
इसका नतीजा यह होता है कि पुलिसवालों को कानून के सही नियमों का पालन करने के लिए कोई इनाम नहीं मिलता, बल्कि उन्हें कानून तोड़कर 'तुरंत नतीजा' दिखाने के लिए उकसाया जाता है।
यह खतरनाक सोच अब सिर्फ पुलिस थानों तक ही सीमित नहीं रह गई है, बल्कि पूरे समाज में फैल चुकी है।
कोविड-19 लॉकडाउन की यादें और औपनिवेशिक मानसिकता
आम नागरिकों और मज़दूरों पर पुलिसिया अत्याचार
कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान दिल्ली, नोएडा और देश के कई अन्य शहरों से ऐसी ढेरों खबरें और रिपोर्ट सामने आई थीं, जिनमें सब्ज़ी बेचने वालों, डिलीवरी करने वाले कर्मचारियों और आम नागरिकों के साथ पुलिस द्वारा की गई मारपीट का पूरा ब्यौरा (Documentation) था।
उस समय ऐसे कई वीडियो वायरल हुए थे जिनमें पुलिस लोगों को सड़कों पर ज़बरदस्ती घुटनों के बल रेंगने (Crawling) पर मजबूर कर रही थी, उन्हें सरेआम बेइज़्ज़त कर रही थी और उनके साथ लाठियों से मारपीट कर रही थी।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये लोग कोई खूंखार अपराधी (Hardened criminals) नहीं थे। इनमें से ज़्यादातर लोग तो लॉकडाउन के कठिन समय में भी हमारे घरों तक राशन और सब्ज़ी जैसी ज़रूरी सेवाएँ (Essential services) पहुँचा रहे थे।
आज़ाद भारत में गुलामी की परछाई
इसके बावजूद, पुलिस और प्रशासन का इस हिंसा के पीछे वही पुराना तर्क (Justification) था: नियमों का पालन कराने के लिए अनुशासन ज़रूरी है, और अनुशासन बनाए रखने के लिए डराना-धमकाना या बल प्रयोग करना ही पड़ेगा।
इस पूरे रवैये से जो संदेश मिला, वह बिल्कुल साफ था—आज भी आम नागरिकों को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में नहीं देखा जाता जिसके पास अपने कुछ पक्के अधिकार (Rights) हैं, बल्कि उन्हें राजा की 'प्रजा' (Subjects) माना जाता है जिनका इकलौता काम सिर्फ सरकार और अधिकारियों के हुक्म का पालन करना है।
इस मायने में, हम कह सकते हैं कि अंग्रेजों के ज़माने की पुलिस व्यवस्था और उनकी गुलामी वाली सोच की परछाई (Shadow of colonial policing) आज के आज़ाद भारत में भी पूरी तरह मंडरा रही है।
स्वीडन और 'बनाना रिपब्लिक' के बीच का अंतर
स्वीडन और जर्मनी का आदर्श उदाहरण
दुनिया के अन्य देशों से तुलना करने पर यह हकीकत बिल्कुल साफ हो जाती है।
स्वीडन (Sweden) का हाल:
स्वीडन में पुलिस कस्टडी (हिरासत) में मौत होना बेहद दुर्लभ (Rare) बात है। अगर कभी ऐसा होता भी है, तो वह आमतौर पर किसी बीमारी (Medical emergency) या आत्महत्या के कारण होता है, और ऐसी घटना होते ही तुरंत एक आज़ाद संस्था द्वारा इसकी जाँच शुरू कर दी जाती है।
वहाँ पुलिस की ट्रेनिंग में इस बात पर सबसे ज़्यादा ज़ोर दिया जाता है कि बिना लड़ाई-झगड़े के मामले को कैसे शांत किया जाए (De-escalation), बातचीत कैसे की जाए और ज़रूरत पड़ने पर कानून के दायरे में रहकर कितनी कम से कम ताकत का इस्तेमाल किया जाए।
यही कारण है कि वहाँ की जनता का अपनी पुलिस पर भरोसा दुनिया में सबसे ज़्यादा है।
जर्मनी (Germany) का हाल:
जर्मनी का ढांचा भले ही स्वीडन से बड़ा और पेचीदा है, लेकिन वहाँ भी हिरासत में मौतें न के बराबर होती हैं और हर मामले की बहुत कड़ाई से जाँच की जाती है। वहाँ पूछताछ के दौरान किसी भी आरोपी को मारना-पीटना या डराना (Coercive interrogation) कानूनन पूरी तरह प्रतिबंधित है।
पुलिस द्वारा ताकत के इस्तेमाल पर बहुत कड़े नियम हैं और अगर कोई पुलिसवाला कानून तोड़ता है, तो उसे अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ता है। इसलिए, वहाँ पुलिस की जवाबदेही (Accountability) किसी एक घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी व्यवस्था का हिस्सा है।
एक महत्वपूर्ण बात:
इन देशों में पुलिस का अच्छा होना सिर्फ इसलिए नहीं है कि वे अमीर देश हैं। यह वहाँ की संस्थाओं की बनावट और उनकी कानून मानने की संस्कृति के कारण है। इन दोनों देशों में 'कानून की सही प्रक्रिया' (Legality) को सबसे ऊपर रखा जाता है, न कि अपने फायदे या शॉर्टकट को।
'बनाना रिपब्लिक' (Banana Republics) की बर्बादी
दूसरी तरफ की कड़वी हकीकत
इस सोच के बिल्कुल दूसरे छोर पर वे देश आते हैं जिन्हें आम भाषा में 'बनाना रिपब्लिक' कहा जाता है। ये ऐसे कमज़ोर देश होते हैं जहाँ सरकारी संस्थाएँ पूरी तरह खोखली होती हैं, कानून का पालन केवल चुनिंदा लोगों (गरीबों और विरोधियों) पर ही किया जाता है और ताकतवर लोग अपनी मनमर्जी से पुलिस और सेना का इस्तेमाल करते हैं।
ऐसी व्यवस्थाओं में पुलिस की हिंसा कोई इकलौती या अचानक हुई गलती नहीं होती। बल्कि, वहाँ हिंसा ही सरकार चलाने का मुख्य ज़रिया बन जाती है। फर्जी एनकाउंटर और गैर-कानूनी हत्याओं को 'काम को जल्दी निपटाने', 'शांति व्यवस्था बनाए रखने' या 'देश की सुरक्षा' के नाम पर सही ठहराया जाता है।
नतीजा यह होता है कि पुलिस पर से जनता का भरोसा पूरी तरह उठ जाता है और कानून का राज केवल नाम का रह जाता है।
इन दोनों के बीच में खड़ा है भारत
भारत की अनोखी और उलझी हुई स्थिति
हमारा देश भारत इन दोनों में से किसी भी एक श्रेणी में पूरी तरह फिट नहीं बैठता।
एक तरफ (सकारात्मक पहलू): भारत के पास एक पूरी तरह स्वतंत्र और ताकतवर अदालत (Judiciary) है, एक बहुत ही मजबूत और महान संविधान है और एक जागरूक समाज व मीडिया (Civil society) है जो गलत के खिलाफ आवाज़ उठाता है।
दूसरी तरफ (चिंताजनक पहलू): हमारे यहाँ लगातार होने वाली पुलिस कस्टडी की हिंसा और मौतें उन लक्षणों को दिखाती हैं जो आमतौर पर किसी कमज़ोर और पिछड़े देश (जैसे बनाना रिपब्लिक) की व्यवस्था में पाए जाते हैं।
इसीलिए कहा गया है कि भारतीय पुलिस व्यवस्था आज स्वीडन और बनाना रिपब्लिक के बिल्कुल बीच में आकर खड़ी हो गई है।
लोकतंत्र का दोहरा चेहरा और सुधार के उपाय
एक चिंताजनक हकीकत
इसका नतीजा यह हुआ है कि आज हमारे यहाँ एक बहुत ही परेशान करने वाली दोहरी (Hybrid) स्थिति बन गई है—हमारा देश बनावट और कागज़ों में तो पूरी तरह लोकतांत्रिक (Democratic) है, लेकिन असल कामकाज और व्यवहार में यह अक्सर दमनकारी और हिंसक (Coercive) दिखाई देता है।
इसके बुरे नतीजे सिर्फ उन पीड़ितों तक सीमित नहीं रहते जो हिंसा का शिकार होते हैं, बल्कि यह हमारी पूरी न्याय व्यवस्था की साख और मान्यता को ही खत्म कर देता है। जब पुलिस मार-पीटकर ज़बरदस्ती जुर्म कबूल (Confessions) करवाती है, तो पूरी जाँच-पड़ताल ही कमज़ोर हो जाती है।
इसके कारण बेकसूर लोग सजा भुगतते हैं और असली अपराधी कानून की आँखों में धूल झोंककर साफ़ बच निकलते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि इससे पुलिस पर से जनता का भरोसा धीरे-धीरे पूरी तरह उठ जाता है।
समाज के पिछड़े और कमज़ोर वर्गों पर इसका सबसे बुरा असर पड़ता है, जिससे वे देश की व्यवस्था से खुद को और ज़्यादा अलग-थलग महसूस करने लगते हैं।
समस्या का समाधान
कानूनी सुधार: कागज़ी नियमों को हकीकत बनाना
इस समस्या को सुधारने के रास्ते कोई अनजान नहीं हैं, सब जानते हैं कि क्या करना है। सबसे पहले, भारत को सभी राज्यों में 'पुलिस शिकायत प्राधिकरण' (Police Complaints Authority - PCA) के नेटवर्क को
मजबूत करना होगा, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने साल 2006 में बनाने का आदेश दिया था। आज के समय में यह संस्था एक 'लंगड़ी बत्तख' (Lame duck - यानी बिना किसी असली ताकत वाली संस्था) बनकर रह गई है।
इसके अलावा, भारत को संयुक्त राष्ट्र के 'प्रताड़ना विरोधी समझौते' (UN Convention Against Torture) को मंज़ूरी देनी होगी ताकि एक मजबूत कानून बन सके।
पूछताछ के लिए 'मेंडेज़ सिद्धांतों' (Méndez Principles) को लागू करना होगा, जो मारपीट के बजाय पक्के सबूतों और वैज्ञानिक तरीकों से पूछताछ करने पर ज़ोर देते हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) को और ज़्यादा ताकतवर बनाना होगा ताकि पुलिस पर कड़ी और निष्पक्ष नज़र रखी जा सके।
सोच और इनाम के तरीके में बदलाव:
सिर्फ नए कानून बना देने से यह बीमारी दूर नहीं होगी। इसके लिए पुलिस को मिलने वाले इनामों और तरक्की के नियमों को बदलना होगा:
पुलिसवालों का प्रमोशन (तरक्की) इस आधार पर होना चाहिए कि उन्होंने कानून के दायरे में रहकर कितनी ईमानदारी से काम किया, न कि इस आधार पर कि उन्होंने मार-पीटकर कितनी जल्दी केस बंद कर दिया।
पुलिस की ट्रेनिंग में मानवाधिकारों का सम्मान करने वाली पुलिसिंग (Rights-based policing) सिखाना अनिवार्य होना चाहिए।
हमारी अदालतों के काम करने की रफ्तार को तेज़ और आसान बनाना होगा।
गरीब और कमज़ोर नागरिकों को बचाने के लिए मुफ्त कानूनी सहायता (Legal aid) के सिस्टम को मजबूत करना होगा।