हमले के बाद ईरान: आने वाले समय में बड़े झटकों के संकेत
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हमले के बाद ईरान: आने वाले समय में बड़े झटकों के संकेत
"आज का ईरान 2003 के इराक जैसा नहीं है। यह (पूरे क्षेत्र में) कहीं अधिक नेटवर्क वाला, गहराई तक पैठ रखने वाला और छापामार जवाबी कार्रवाई में कहीं अधिक अनुभवी है।"
ईरान पर अमेरिकी हमला तुरंत तनाव को बढ़ाएगा, उसे रोक नहीं पाएगा: सैन्य कार्रवाई केवल दो देशों के बीच के संघर्ष तक सीमित नहीं रहेगी। यह एक ऐसे बड़े टकराव का रूप ले लेगी जिसमें अमेरिकी सैन्य ठिकाने, खाड़ी देशों के बुनियादी ढांचे और क्षेत्र में ईरान के सहयोगी गुट (Proxies) भी शामिल होंगे।
वैश्विक ऊर्जा प्रणाली पर सीधा खतरा: दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल की आपूर्ति 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) से होती है। वहां होने वाली ज़रा सी भी रुकावट तेल की कीमतों में भारी उछाल लाएगी, सप्लाई चेन को बाधित करेगी और पूरी दुनिया में महंगाई बढ़ा देगी।
आर्थिक झटकों से राजनीतिक अस्थिरता पैदा होगी: ऊर्जा संकट से महंगाई बढ़ेगी और खाद्य पदार्थों (खाने-पीने) की कीमतें ऊपर जाएंगी। इसका सबसे बुरा असर उन देशों पर पड़ेगा जो आयात पर निर्भर हैं। इससे वहां अशांति और बड़े स्तर पर भू-राजनीतिक अस्थिरता का खतरा बढ़ जाएगा।
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अमेरिका खाड़ी क्षेत्र में अपनी बड़ी नौसैनिक और हवाई ताकत इकट्ठा कर रहा है। वह ईरान की मारक क्षमता के दायरे में अपने विमानवाहक पोत (Carrier strike groups), बमवर्षक विमान और मिसाइल रक्षा प्रणालियाँ तैनात कर रहा है।
यह कोई सामान्य सैन्य अभ्यास या संकेत मात्र नहीं है। यह 2003 के इराक आक्रमण के बाद की सबसे बड़ी सैन्य घेराबंदी है, जब सत्ता परिवर्तन के लिए 1.5 लाख से अधिक अमेरिकी सैनिक तैनात किए गए थे।
जो चीज़ इस पल को अलग बनाती है, वह सैन्य क्षमता नहीं बल्कि परिस्थितियाँ हैं।
आज का ईरान 2003 के इराक जैसा नहीं है। यह कहीं अधिक नेटवर्क वाला, क्षेत्रीय रूप से मज़बूत और 'छापामार युद्ध' (Asymmetric Retaliation) की कला में कहीं अधिक अनुभवी है।
उसने पिछले चार दशक इसी तरह की स्थिति का सामना करने की तैयारी में बिताए हैं।
2020 में कासिम सुलेमानी की हत्या के जवाब में ईरान ने इराक में अमेरिकी ठिकानों पर सीधे मिसाइल हमले किए थे, जिसमें 100 से अधिक कर्मचारी घायल हुए थे।
2019 में सऊदी अरब के तेल बुनियादी ढांचे पर हुए हमलों ने कुछ ही घंटों में वैश्विक तेल आपूर्ति के लगभग 5 प्रतिशत हिस्से को अस्थायी रूप से ठप कर दिया था। वे नपे-तुले जवाब थे, न कि पूर्ण युद्ध।
ईरानी क्षेत्र पर अमेरिका का कोई भी सीधा हमला केवल एक सीमित जवाबी कार्रवाई तक नहीं रुकेगा। यह कई मोर्चों पर एक के बाद एक बड़ी कार्रवाइयों की शुरुआत कर देगा।
अब 'युद्ध को रोकने' (Deterrence) और 'युद्ध शुरू होने' (Conflict) के बीच की सीमा केवल किताबी नहीं, बल्कि असलियत में परखने के करीब है।
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एक संकरा समुद्री रास्ता अब पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था का बोझ उठाए हुए है। 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) से दुनिया के कुल तेल उपभोग का लगभग 20 प्रतिशत और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा गुज़रता है।
हर दिन यहाँ से लगभग 1.7 से 2 करोड़ बैरल तेल निकलता है। यह केवल एक आंकड़ा नहीं है; यह पूरी दुनिया की इस रास्ते पर ढांचागत निर्भरता है। यहाँ होने वाली कोई भी रुकावट तुरंत कीमतों में भारी उछाल लाएगी।
यदि यहाँ यातायात थोड़ी देर के लिए भी रुकता है, तो तेल की कीमतें काबू से बाहर हो जाएंगी। जहाजों के बीमा की दरें (Insurance premiums) आसमान छूने लगेंगी और वैश्विक सप्लाई चेन ठप पड़ जाएगी। इतिहास पहले ही इस कमजोरी का असर दिखा चुका है:
1973 का तेल प्रतिबंध: कीमतों में चार गुना बढ़ोतरी हुई और पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं में भारी मंदी और महंगाई (Stagflation) फैल गई।
1990 का कुवैत पर हमला: कुछ ही महीनों में तेल की कीमतें दोगुनी हो गई थीं। ये कोई लंबी घेराबंदी नहीं थी, बल्कि केवल सीमित समय की रुकावटें थीं।
आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था पहले के मुकाबले कहीं अधिक एक-दूसरे से जुड़ी हुई और कहीं अधिक नाजुक है। ऊर्जा बाज़ार में सप्लाई कम है, कई देशों में महंगाई पहले से ही बढ़ी हुई है, और महामारी (Pandemic) के बाद सप्लाई चेन अभी तक पूरी तरह स्थिर नहीं हुई है।
ईरान को इस रास्ते को पूरी तरह बंद करने की ज़रूरत नहीं है। केवल आंशिक रुकावट, जैसे कि समुद्री सुरंगें (Mining) बिछाना, ड्रोन से परेशान करना, या टैंकरों को ज़ब्त करना ही उसके रणनीतिक लक्ष्य पूरे कर देगा।
इसलिए, वैश्विक अर्थव्यवस्था को किसी लंबे युद्ध की ज़रूरत नहीं है, बल्कि रुकावट के छोटे-छोटे झटके ही पूरी व्यवस्था को अस्थिर करने के लिए काफी हैं।
ईरान के साथ संघर्ष केवल दो देशों के बीच (Bilateral) नहीं रहेगा। यह एक नेटवर्क की तरह फैला हुआ होगा। ईरान ने पूरे क्षेत्र में 'निवारण' (Deterrence) की एक बहुस्तरीय प्रणाली तैयार की है। लेबनान में हिज़्बुल्लाह के पास हज़ारों रॉकेट हैं।
इराक में शिया मिलिशिया अमेरिकी ठिकानों के पास सक्रिय हैं। यमन के हूतियों ने सऊदी और अमीराती क्षेत्रों में गहराई तक हमला करने की अपनी क्षमता साबित कर दी है। यह केवल किताबी क्षमता नहीं है, बल्कि इसका बार-बार प्रदर्शन किया गया है।
तनाव बढ़ने (Escalation) का तर्क सीधा और अनुमान लगाने योग्य है। यदि अमेरिका ईरान की संपत्तियों पर हमला करता है, तो ईरान अमेरिकी ठिकानों या उनके सहयोगियों के बुनियादी ढांचे पर जवाबी हमला करेगा। वह जवाबी हमला अमेरिका को फिर से बड़ी कार्रवाई के लिए उकसाएगा।
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हर चक्र के साथ युद्ध का मैदान और चौड़ा होता जाएगा
इराक युद्ध इसका एक स्पष्ट उदाहरण पेश करता है। जो 2003 में सत्ता को तेज़ी से हटाने के अभियान के रूप में शुरू हुआ था, वह एक लंबे विद्रोह में बदल गया जिसने एक दशक से अधिक समय तक इस क्षेत्र को अस्थिर रखा। 2011 के बाद सीरियाई संघर्ष भी आंतरिक अशांति से बढ़कर एक बड़े युद्ध में बदल गया जिसमें वैश्विक और क्षेत्रीय शक्तियाँ शामिल हो गईं।
समुद्र में तनाव बढ़ना भी उतना ही तय है। ईरान का 'असममित नौसैनिक सिद्धांत' (Asymmetric Naval Doctrine) तेज़ नौकाओं, ड्रोनों और तटीय मिसाइलों का उपयोग करके 'स्वार्म टैक्टिक्स' (झुंड बनाकर हमला करने की तकनीक) पर आधारित है। वह पारंपरिक रूप से अमेरिकी नौसेना को नहीं हरा सकता, लेकिन उसे इसकी ज़रूरत भी नहीं है। उसे बस व्यवस्था में अनिश्चितता पैदा करनी है और भारी नुकसान पहुँचाना है।
किसी बड़ी नौसैनिक संपत्ति पर एक भी सफल हमला वाशिंगटन में राजनीतिक समीकरण बदल देगा। घरेलू दबाव शांति के बजाय और अधिक हमलावर होने की मांग करेगा। यही मुख्य जोखिम है। एक बार पहला हमला होने के बाद, नियंत्रण योजनाकारों (Planners) के हाथ से निकलकर 'प्रतिक्रियाओं' (Reactions) के हाथ में चला जाता है। तनाव बढ़ना फिर एक चुनाव नहीं, बल्कि एक सिलसिला बन जाता है।
इसका तात्कालिक परिणाम ऊर्जा आपूर्ति में बाधा होगा। तेल की कीमतों में भारी उछाल आएगा और गैस बाज़ार में कमी हो जाएगी। 'रणनीतिक भंडार' (Strategic Reserves) शुरुआती झटके को तो झेल सकते हैं, लेकिन वे लंबे समय तक चलने वाली रुकावट की भरपाई नहीं कर पाएंगे।
दूसरा प्रभाव: महंगाई (Inflation) ऊर्जा का सीधा संबंध परिवहन, निर्माण (Manufacturing) और कृषि से है। ईंधन की बढ़ती कीमतें खाद्य पदार्थों के दामों को ऊपर धकेल देंगी। उर्वरक (Fertiliser) उत्पादन, जो पहले से ही ऊर्जा की कीमतों के प्रति संवेदनशील है, नए दबाव का सामना करेगा।
तीसरा प्रभाव: आर्थिक अस्थिरता वे उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं (Emerging Economies) जो तेल आयात पर बहुत अधिक निर्भर हैं, उन्हें मुद्रा के उतार-चढ़ाव और 'भुगतान संतुलन संकट' (Balance of Payments Crisis) का सामना करना पड़ेगा। विकसित देशों को फिर से बढ़ती महंगाई का सामना करना होगा, जिससे उनकी आर्थिक नीतियां जटिल हो जाएंगी।
चौथा प्रभाव: राजनीतिक संकट इतिहास गवाह है कि भोजन और ईंधन के संकट ने हमेशा अशांति को जन्म दिया है। 2011 की 'अरब स्प्रिंग' (Arab Spring) भी बढ़ती खाद्य कीमतों और आर्थिक तनाव के बाद ही शुरू हुई थी। आर्थिक संकट बहुत तेज़ी से राजनीतिक अस्थिरता में बदल जाता है।
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अंत में, खुद इस क्षेत्र (पश्चिम एशिया) में 'देशों के विफल होने' (State Failure) का जोखिम है। 9 करोड़ से अधिक की आबादी वाला ईरान कई संवेदनशील सीमाओं के केंद्र में स्थित है।
वहां की आंतरिक अस्थिरता केवल वहीं तक सीमित नहीं रहेगी। इसके बाद शरणार्थियों का पलायन, विद्रोही गुटों का बिखराव और सीमा पार संघर्ष शुरू हो जाएगा।
यह केवल एक क्षेत्रीय रुकावट नहीं है। यह एक के बाद एक आने वाला वैश्विक संकट (Cascading Global Crisis) है।
"ईरान पर किया गया हमला एक ऐसी 'चेन रिएक्शन' (श्रृंखला प्रतिक्रिया) शुरू कर देगा, जो सैन्य लक्ष्यों से कहीं आगे तक जाएगी। ऊर्जा बाज़ार अस्थिर हो जाएंगे, आर्थिक प्रणालियाँ झटके झेलेंगी और राजनीतिक व्यवस्थाएँ भारी दबाव में आ जाएँगी।
यह सैन्य क्षमता (Capability) का सवाल नहीं है, बल्कि उसके परिणामों (Consequence) का सवाल है।
यदि यह तनाव आगे बढ़ता है, तो इससे होने वाली तबाही केवल उस क्षेत्र (Middle East) तक सीमित नहीं रहेगी। यह पूरी वैश्विक व्यवस्था (Systemic) के लिए एक संकट बन जाएगी।"
..... समाप्त
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